कुण्डली में मंगल दोष, उसका असर एवं निराकरण ।।

कुण्डली में मंगल दोष, उसका असर एवं निराकरण ।। MangalDosha-Prabhav-And-Nidan.

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,

मित्रों, मंगल के विषय में एक श्लोक थोड़े-बहुत हेर-फेर के साथ लगभग सभी ज्योतिष के शास्त्रों में लिखा है । लग्ने व्यये च पाताले जामित्रे चाष्टमे कुजे । भर्तु: कन्या विनाशाय कन्या भर्तु: विनाशकृत् ।।

अर्थात् जन्म कुण्डली में मंगल १, ४, ७, ८ और बारहवें घर में बैठा हो तो जातक मंगला या मंगली अथवा मांगलिक होता है । ये दोष किसी वर की कुण्डली में हो तो कन्या की मृत्यु और कन्या की कुण्डली में हो तो वर की मृत्यु निश्चित ही हो जाती है ।।

चन्द्र लग्न से भी ये स्थिति हो तो यही फल होता है । ऐसे जातकों के जीवन में दाम्पत्य सुख का लगभग अभाव ही होता है । ऐसा ज्योतिष के आचार्यों का भी मत है । परन्तु मेरा अनुभव ये हैं, कि ये दोष सिर्फ प्रथम विवाह तक ही अशुभ फलदायी होता है ।।

चलिये इस विषय में और विस्तार से बात करेंगे इस लेख के अंतिम लाइनों में । अभी यहाँ हम इस विषय में महर्षि पराशर के विचारों को देखते हैं, कि मंगल किस घर में बैठा हो तो जातक को क्या शुभाशुभ फल देता है ।।

कुजे लग्ने तू चापल्यात्क्षतं स्वे धननाशनम् ।
विक्रमे भ्रातृमरणं धनलाभ: सुखं यशः ।।
चतुर्थे बन्धुमरणं शत्रुवृद्धिर्धनव्ययम् ।। ५३।।

अर्थ:- मंगल लग्न में हो तो चंचल स्वभाव के कारण चोट लगने से रोग होता है । दुसरे में हो तो धननाश, तीसरे में हो तो भ्रातृनाश परन्तु धन-यश की प्राप्ति एवं सुख हो । चौथे में हो तो बन्धुहानि, शत्रुवृद्धि एवं धन का बहुत अधिक खर्च हो ।।

पञ्चमे पितृहानिं च धनायति सुतौ यशः ।
षष्ठे रिपुसमृद्धिं च जयं बन्धुसमागमम् ।।५४।।

अर्थ:- पांचवे भाव में हो तो पिता की हानि परन्तु धन, पुत्र एवं यश का लाभ करवाता है । छठे में शत्रुवृद्धि करवाता है परन्तु विजय, बन्धुओं से मिलन तथा धन का लाभ भी बहुत मात्रा में देता है ।।

अर्थवृद्धिं स्त्रियां दारमरणं नीचसेवनम् ।।
नीचस्त्रीसंगमो मृत्यौ धननाशं पराभवम् ।।५५।।

अर्थ:- सातवें भाव में मंगल हो तो स्त्री को कष्ट, नीच लोगों की सेवा एवं नीच स्त्री से समागम । आठवें भाव में मंगल की उपस्थिति जातक को धननाश, पराजय और अनर्थ ही अनर्थ देती है ।।

पराभवमनर्थं च धर्मे पापरूचिक्रिया ।।
धनव्ययं च दशमे धनलाभं कुकर्म च ।।५६।।

अर्थ:- नवम में मंगल पापकर्म में रूचि जगाता है एवं धन की हानि करवाता है । दशमस्थ मंगल जातक को धनी बनाता है परन्तु ऐसा जातक कुकर्मी अर्थात कुकर्म (न करने लायक कर्म) करने वाला हो जाता है ।।

लाभे धनं सुखं वस्त्रं स्वर्णक्षेत्रादिसंग्रहम् ।।
व्यये नेत्ररुजं भ्रातृनाशं च कुरुते कुजः ।।५७।।

अर्थ:- ग्यारहवें भाव में बैठा मंगल, जातक को धन, स्वर्ण,वस्त्र एवं भूमि का लाभ देता है । परन्तु बारहवें भाव का मंगल जातक को नेत्र रोगी बनाता है तथा अपने ही सगे भाइयों का अनिष्ट करने वाला बना देता है अथवा जातक ऐसे स्वभाव का होता है ।।

मित्रों, कुल मिलाकर अगर देखा जाय तो मंगल तीसरे, पाँचवें, छठे, दशवें और ग्यारहवें भाव में रहे तो शुभ फल देता है । और इन घरों में भी कुछ-न-कुछ एक छिन ही लेता है अर्थात कुछ सामान्य हानि करने के बाद ही शुभ फल देता है ।।

मंगल एक विभक्ति कारक ग्रह माना गया है । इसे विखंडनकारी ग्रह भी कहा जाता है । ऐसे में ये जहाँ भी बैठे उस घर की हानि ही करता है । यहाँ अशुभ घरों में बैठता है तो उसके अशुभ फलों को नष्ट कर देता है उसके उपरान्त शुभ फल मिलता है जातक को ।।

मित्रों, परन्तु यही मंगल जब किसी शुभ भाव में बैठता है तो उसके शुभ फलों को नष्ट कर देता है और परिणाम स्वरुप अशुभ फल ही जातक के लिए बच जाता है । कुछ विद्वानों के अनुसार मंगल से भी ज्यादा मंगल की दृष्टि हानिकारक होती है ।।

उदहारण के लिये मंगल यदि पञ्चम भाव में बैठता है तो सन्तान की हानि नहीं करता है । उपरोक्त श्लोकों में वर्णन है इस बात का आप देखें । परन्तु यही मंगल जब ग्यारहवें भाव में बैठता है तो सन्तान सुख का अभाव जीवन में कर देता है । स्पष्ट है, कि मंगल की दृष्टि उससे ज्यादा हानिकारक होती है ।।

मित्रों, इसी प्रकार हम अपने अगले लेख में किसी और ग्रह के विषय में आपलोगों के लिए पूर्ण प्रामाणिक एवं सारगर्भित विषय लेकर उपस्थित होंगे । इसलिए आपलोग हमारे फेसबुक के ऑफिसियल पेज - Astro Classes, Silvassa. को अवश्य लाइक करें ताकि इस विषय का लाभ आपको सहजता से प्राप्त हो सके ।।

ऊपर जिस मंगल दोष का वर्णन हमने किया है, विद्वानों के अनुसार उसका वैवाहिक जीवन पर बहुत ही बुरा असर होता है । परन्तु प्रथम विवाह पर ही ये दोष लागू होता है । तो इसीलिए शायद हमारे पूर्वज ऋषियों ने कुम्भ विवाह का विकल्प दिया है ।।

कारण ये प्रतीत होता है, कि घट अथवा पीपल वृक्ष के साथ सात फेरे ले लेने से जातक का विवाह भगवान नारायण के साथ हो जाता है । और भगवान तो सबके पति हैं, पाति लोकं इति पतिम् । अर्थात जो पालन करे वो पति होता है ।।

मित्रों, भगवान तो सभी के पालनकर्ता हैं तो उनके साथ विवाह कोई अनैतिक तो नहीं प्रतीत होता । और प्रथम विवाह पर लगने वाला ये मंगल दोष भी निवृत्त हो जाता है । फिर चाहे वो जातक स्त्री हो या पुरुष ।।

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।। नारायण नारायण ।।

 

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