वृषभ लग्न की कुण्डली में माणिक्य धारण करें या ना करें ।।

वृषभ लग्न की कुण्डली में माणिक्य धारण करें या ना करें ।। Vrishabh Lagna Ki Kundali Me Manikya Dharan.

हैल्लो फ्रेण्डzzz,


मित्रों, वृषभ लग्न की कुंडली में सूरज देवता ज्यादा योग कारक ग्रहों की गिनती में नहीं आते हैं । क्योंकि सूरज देवता इस कुंडली में सम ग्रह होते है । क्योंकि यहाँ वह एक बहुत अच्छे घर का मालिक होते है और लग्नेश का शत्रु होने की वजह से इसे सम ग्रह की पदवी प्राप्त है ।।

लेकिन अगर सूर्य की दशा अंतर्दशा चल रही हो और सूर्य की महादशा-अंतर्दशा में जातक का मकान, गाड़ी, भूमि और वाहन आदि ना बन रहा हो और जातक यह सब प्राप्त करना चाहता हो तो कुछ कंडीशन में किसी विद्वान की सलाह ले करके यहां सूरज देवता का रत्न माणिक धारण किया जा सकता है ।।

इन स्थितियों में माणिक धारण करना आपके लिए सदैव लाभदायक हो जाता है । लेकिन पर्टिकुलर कंडीशन में किसी विद्वान की सलाह लेकर ही । वृषभ लग्न की कुंडली में सूरज देवता अगर लग्न में बैठे हो और मकान ना बन रहा हो, सूर्य की दशा-अंतर्दशा चल रही हो और आपको गाड़ी लेनी हो, वाहन लेना हो, प्रॉपर्टी बनाने हो अथवा आप की माता की सेहत ठीक नहीं रहती हो तो थोड़े टाइम के लिए आप सूरज देवता कर रत्न माणिक धारण कर सकते हैं ।।

यहाँ इन स्थितियों में माणिक धारण करना सदैव आपके लिए फायदेमंद होगा लेकिन ऐसा सिर्फ इतनी देर तक कर सकते हैं जितनी देर तक सूर्य की दशा-अंतर्दशा चल रही हो और उससे आपको लाभ लेना हो । साथ ही सूर्य डिग्री vice बलहीन हो करके बैठा हो तो ।।

मित्रों, सूर्य यदि दूसरे भाव में पड़ा हो तो भी सूरज का रत्न माणिक धारण किया जा सकता है । उसकी दशा-अंतर्दशा में आपको उसका लाभ अवश्य मिलेगा । सूर्य यदि तीसरे भाव में बैठा हो तो माणिक धारण करना सदैव वर्जित माना जाता है । किसी कीमत पर यहाँ माणिक धारण नहीं किया जाता वह माता को भी कष्ट देता है ।।

साथ ही छोटे भाई बहन से भी तकलीफ देता है । अकारण यात्राएं भी होती है जिससे जातक को लाभ नहीं मिलता । यहां बैठे सूर्य की दृष्टि नवम भाव पर पड़ती है जो पिता से सम्बन्धों को ख़राब करता है तथा किसी तरह से शुभ फल नहीं देता । ऐसा जातक धर्म को मानने वाला भी नहीं होता है । यहाँ सूर्य चौतरफा नुकशान करनेवाला ही होता है ।।

मित्रों, चतुर्थ भाव में स्वगृही सूर्य हो तो आपके लिये मकान, गाड़ी, भूमि एवं वाहन बनवाने वाला होता है । परन्तु आप सूर्य की दशा-अंतर्दशा में ही माणिक पहन कर के मकान, गाड़ी, भूमि एवं वाहन बनाने का एडवांटेज ले सकते हैं । ऐसे में सूर्य आपको सदा लाभ ही देता है । सूर्य अगर पंचम भाव में हो तो पुत्र प्राप्ति का योग अवश्य बनाता है ।।

यहाँ सूर्य का पहना हुआ रत्न आपके घर पुत्र संतान की प्राप्ति के योग बनाते हैं । क्योंकि सूरज को एक मेल ग्रह की पदवी प्राप्त है, इस वजह से पंचम में बैठे हुये सूर्य का रत्न धारण करके आप उसे एक्टिवेट कर के एक मेल सन्तान का योग अवश्य बनवा सकते हैं ।।

परन्तु सूर्य की दशा-अन्तर्दशा देखना अति आवश्यक होते है उसके बिना माणिक्य रत्न धारण करना वर्जित माना जाता है । यहाँ आपका सूर्य से सम्बन्धित कोई कार्य अटका हो अथवा सूर्य से जुड़ा हुआ आपका कोई काम हो तो ही उसे धारण करना चाहिये ।।

मित्रों, सूर्य अगर छठे भाव में बैठे हों तो कभी गलती से भी इसका रत्न माणिक्य धारण मत कीजिएगा । यहां जातक कि माता, गाड़ी, भूमि तथा भवन का मालिक उठकर छठे भाव बैठ जाता है तो रोग, ऋण, कर्जा, दुर्घटना और मुकदमा आदि को एक्टिवेट कर देता है जिससे मकान का लेट बनना, माता के स्वास्थ्य में प्रॉब्लम आना इन सारी चीजों में सूर्य बढ़ोतरी कर देता है ।।

यहां से सूर्य अपनी दृष्टि द्वादश भाव पर डालते हैं जिसके फलस्वरूप जातक के अस्पताल के खर्चे, जेल यात्रा एवं कोर्ट-कचहरी की मुश्किलें बढ़ाते हैं । इसलिये यहाँ के सूर्य का रत्न भूलकर भी धारण नहीं किया जाता है ।।

मित्रों, अगर सूर्य सप्तम भाव में बैठे हों तो मकान, गाड़ी, भूमि भवन बनाने के लिए आप माणिक्य पहन सकते हैं । लेकिन सूर्य का रत्न यहां पार्टनरशिप में थोड़ी सी डिस्टरबेंस अवश्य देता है । क्योंकि सूर्य भी एक विभक्ति कारक ग्रह ही माना जाता है और बहुत ज्यादा अच्छा नहीं माना जाता । यही कारण है, कि यह यहाँ दाम्पत्य सुख के लिए भी अच्छा नहीं माना जाता है ।।

लेकिन जो लोग अविवाहित हैं और उनको रोजमर्रा की जिंदगी में समस्याएं आ रही हो तो यहां पर सूर्य का रत्न माणिक्य धारण करके अपने जीवन में कुछ रस घोल सकते हैं । परन्तु यहाँ माणिक्य धारण करना जातक के वैवाहिक जीवन से लेकर उसके पार्टनरशिप और बिजनेस को भी प्रभावित करता है, जिसका परिणाम कुछ अच्छा नहीं होता ।।

मित्रों, सप्तम भाव में बैठा हुआ सूर्य अपनी सप्तम दृष्टि लग्न पर डालता है जिससे जातक अग्रेसिव हो जाता है अर्थात गुस्सैल हो जाता है । जिसका परिणाम उसके वैवाहिक जीवन और उसके बिजनेस पार्टनर पर बुरा पड़ता है । इसलिए सप्तम भाव में बैठे हुए सूर्य का रत्न दशा-अंतर्दशा और डिग्री बलाबल देखने के बाद केवल उसकी दशा-अंतर्दशा में ही धारण किया जाना उचित रहेगा ।।

मित्रों, अष्टम भाव में बैठे हुए सूर्य का रत्न भूल कर के भी नहीं धारण करना चाहिए । क्योंकि सूर्य वृषभ लग्न की कुंडली में वैसे ही बहुत ज्यादा शुभ फलदाई ग्रह नहीं माना जाता । ऐसे में अष्टम भाव में बैठे हुए सूर्य का रत्न पहनना अशुभ फलदाई सूर्य को एक्टिवेट कर देना अर्थात जागृत कर देना होगा । जिसकी वजह से माता, भवन, भूमि, वाहन, जायदाद आदि के सुख इंसान वंचित रह जाता है ।।

मित्रों, अष्टम भाव में बैठे हुए सूर्य की सप्तम दृष्टि दूसरे घर पर पड़ती है । जिसकी वजह से धन, कुटुंब, वाणी और माता के स्वास्थ्य के ऊपर निगेटिव असर डालता है । जिसके वजह से इस सब से संबंधित बातों का जातक को अत्यधिक नुकसान होता है ।।

दूसरे घर पर सूर्य की दृष्टि यानी कि उसके वाणी से उसका नियंत्रण खो जाना । कब कहा क्या बोलना है यह समझ में नहीं आता जिसकी वजह से जातक का बहुत नुकसान हो जाता है । ठीक है, इसलिए किसी भी स्थिति में अष्टम भाव में बैठे हुए सूर्य का रत्न भूलकर भी धारण ना करें ।।

मित्रों, वृषभ लग्न की कुंडली में नवम भाव में बैठे हुए सूर्य का रत्न उसकी दशा-अंतर्दशा में अगर आप पहनते हैं तो यह सूर्य आपको माता का सुख, भूमि यानी प्रॉपर्टी, भवन अर्थात् खुद का मकान यह सब दे सकता है । परंतु नवम भाव में बैठे हुए सूर्य की सप्तम दृष्टि तीसरे घर पर पड़ती है तो यह सूर्य अपने छोटे भाई बहनों से झगड़ा करवाता है ।।

बिना मतलब की यात्रायें करवाना और विदेश यात्रा से नुकसान करवाना सिर्फ यही करवाता है । सिर्फ और सिर्फ नवम भाव में बैठे हुए सूर्य का रत्न केवल इतने समय तक ही धारण किया जा सकता है, जब उसकी दशा-अंतर्दशा हो और अपना खुद का मकान न हो, वाहन सुख चाहिए, तो पहनने में कोई आपत्ति नहीं है । लेकिन जैसे ही अपना घर हो जाए वाहन सुख मिल जाए तो सूर्य का रत्न उतार देना चाहिए इसी में जातक की भलाई है ।।

मित्रों, वृषभ लग्न की कुंडली में दशम भाव में बैठे हुए सूर्य का रत्न माणिक्य धारण कर सकते हैं । क्योंकि यहां बैठा हुआ सूर्य दिशा बली होता है और अपने घर को देख रहा होता है । जिसके वजह से इस सूर्य की दशा-अंतर्दशा में पहने गए उसके रत्न जातक को भूमि, भवन, जायदाद एवं माता का सुख अवश्य ही देते हैं ।।

लेकिन मित्रों, एक बात आप सदैव याद रखना, कि वृषभ लग्न की कुंडली में सूर्य का रत्न माणिक्य लाइफ टाइम स्टोन नहीं होता है । यहाँ बैठे सूर्य का रत्न अपने मौका के अनुसार हम धारण कर सकते हैं । पर जीवन भर धारण करके उसको नहीं रख सकते ।।

मित्रों, दशम भाव में बैठे हुए सूर्य का रत्न आप तब तक धारण ना करें जब तक कोई विद्वान ब्राम्हण ज्योतिषी आपको पहनने को ना कहें । क्योंकि बहुत गहराई से अध्ययन के उपरांत सूर्य के बलाबल को देख करके ही उसके बाद उसकी दशा-अंतर्दशा हो तभी आप उसका रत्न धारण करें अन्यथा आप को नुकसान हो सकता है ।।

मित्रों, वृषभ लग्न की कुंडली में सूर्य यदि ग्यारहवें भाव में बैठा हो तो ऐसे सूर्य का रत्न माणिक्य धारण किया जा सकता है । क्योंकि यहां बैठा सूर्य अपनी दशा-अंतर्दशा में माता को सुख और माता से जातक को सुख देने में सक्षम होता है । भूमि, भवन, जायदाद, प्रॉपर्टी आदि सब कुछ देने में सक्षम होता है ।

लेकिन यह रत्न केवल सूर्य की अपनी दशा और अंतर्दशा में ही फायदा करता है । इसलिए बहुत सोच समझकर के किसी श्रेष्ठ विद्वान ब्राह्मण से सलाह ले कर के ही माणिक्य धारण करें । क्योंकि वृषभ लग्न की कुंडली में सूर्य कारक ग्रह नहीं होता है । इसलिए इसका रत्न जब भी धारण करना हो, बहुत सोच समझ कर के ही धारण करना चाहिए ।।

किसी श्रेष्ठ विद्वान ज्योतिषी से सलाह ले कर के ही वृषभ लग्न की कुंडली में कहीं भी सूर्य का प्लेसमेंट हो तो आप माणिक्य धारण कर सकते हैं । अगर बिना सलाह के धारण करते हैं तो आपको नुकसान हो सकता है । अगर 11 में भाव में सूर्य बैठा हो और आपको कोई संतान ना हो तो आप सूर्य की दशा-अंतर्दशा अथवा उसकी प्रत्यंतर दशा में भी उसका रत्न माणिक्य धारण करके अपने जीवन में संतान का योग अवश्य ही बना सकते हैं ।।

मित्रों, बारहवें भाव में मेष राशि का सूर्य उच्च का होता है । ऐसे में ये सोंचकर, कि सूर्य चतुर्थ भाव का मालिक है, उच्च स्थिति में बैठा हुआ है यह जानकर के अगर गलती से भी आपने माणिक्य धारण कर लिया तो आपके हॉस्पिटल के खर्चे और आपके बाकी के सारे खर्चे और ज्यादा अनियंत्रित हो जाएंगे ।।

आपके जीवन में ऋण, रोग, कर्जा और मुकदमा यह सब अचानक ही आ जाएगा । जिसके वजह से आपकी जिंदगी परेशान और तबाह हो जाएगी क्योंकि 12वें घर में बैठा सूर्य अपनी सप्तम दृष्टि से छठे भाव को देखता है । वैसे तो वृषभ लग्न की कुंडली में माणिक्य रत्न धारण नहीं करना चाहिए । लेकिन यत्किंचित परिस्थितियों में किसी विद्वान श्रेष्ठ ब्राम्हण से सलाह लेकर के उसकी दशा-अंतर्दशा में उसका रत्न धारण करने से फायदा भी हो जाता है ।।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

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