जीवन में कुण्डली से जीवनसाथी का चयन ।।

जीवन में कुण्डली से जीवनसाथी का चयन ।। Jeevan Me Kundali Se Life Partner Ka Chayan.
 
हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,
 
मित्रों, वैवाहिक जीवन को सुखद बनाने के लिए जन्मकुण्डली में जातक के दांपत्य सुख और संतान सुख के तथ्यों पर विचार करना भी अति आवश्यक होता है । क्योंकि यह वैवाहिक जीवन का मूल स्रोत अथवा यूँ कहें की मूल स्तंभ होता है । साथ ही जीवनसाथी के चयन में थोड़ी सी सतर्कता से भी वैवाहिक जीवन में हम आनंद रस घोल सकते हैं ।।
 
वैवाहिक जीवन का बंधन अत्यन्त पवित्र होता है तथा विवाह को दीर्घकाल तक निर्बाध गति से चलाने हेतु दोनों बच्चे पूर्ण सक्षम हैं या नहीं, इन सभी का अनुमान लगाना अति आवश्यक होता है । यदि आप ज्योतिषशास्त्र का सहारा लेते हैं तो निश्चय ही आप अपने लिये एक सच्चे जीवनसाथी का चुनाव तथा अपने प्रणय संबंध को दीर्घकाल तक चला पाएंगे ।।
 
मित्रों, प्रेमी या प्रेमिका के साथ जीवन पर्यंत सुखपूर्वक रहने के लिये आपको ज्योतिष का सहारा अवश्य ही लेना चाहिये । अन्यथा लुट जाने के बाद, बर्बाद हो जाने के बाद, अपमानित, तिरस्कृत, लज्जित होने के बाद आपको इस बात का एहसास होगा । फिर मिट जाने के अलावा, आप के हाथ में कुछ नहीं होगा ।।
 
इसलिए सर्वप्रथम यह आवश्यक है कि आप किसी विद्वान ज्योतिषी से कुंडली मिलान करा लें । यह वैवाहिक जीवन की खुशहाली के लिए प्रथम कसौटी होता है । परंतु मात्र गुण मिलान ही अच्छे जीवन साथी के चुनाव के लिये आवश्यक नहीं होता है । प्रत्येक जातक के जन्मांग में ज्योतिषीय योग एवं कुयोग भी होते हैं ।।
 
मित्रों, आपकी कुण्डली में आपका सप्तमेश, किसी केन्द्र अथवा त्रिकोण में स्थित हो और यदि स्वयं सप्तमेश या द्वितीयेश की दृष्टि पड़ रही हो तो जातक अपनी पत्नी तथा धन के साथ पूर्ण सुख का भोग अपने जीवन में करता है । शुक्र किसी केन्द्र, त्रिकोण या स्वराशि में हो और द्वितीयेश अथवा सप्तमेश चतुर्थ भाव में हो तो जातक आदर्श दांपत्य सुख पाता है ।।
 
सशक्त शुक्र, कलत्र भाव में बुध से युत या दृष्ट हो तो जातक अत्यंत कामुक होता है । ऐसे में प्रेम मात्र दिखावा होता है एवं ऐसे जातक का वैवाहिक जीवन असंतुलित हो जाता है । शनि एवं राहु यदि शुक्र से सम्बन्ध बना लें तो जातक के प्रेम में वासना का मिश्रण हो जाता है एवं उसके अनेक अवैध सम्बन्ध भी होते हैं ।।
 
मित्रों, यदि सप्तम का स्वामी छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो और पंचम का स्वामी किसी अन्य भाव में हो (सप्तमेश के साथ न हो) तो निश्चय है कि प्रेम विवाह या विवाह के बाद जातक का दांपत्य जीवन कष्ट पूर्ण होता है । सप्तमेश पाप ग्रहों से युक्त हो या शुक्र और सप्तमेश एक ही भाव में अन्य ग्रहों विशेषतः पापी ग्रहों से युक्त हों तो जातक के एक से अधिक अवैध सम्बन्ध होते हैं ।।
 
यही उपरोक्त स्थिति यदि सप्तमेश और चतुर्थेश के एक साथ होने तथा पाप ग्रहों से युक्त होने पर भी होती है । यदि शुक्र द्वितीय, षष्ठ या सप्तम भाव में पाप ग्रहों से युक्त हो तो जातक अपनी पत्नी के अतिरिक्त अन्य स्त्रियों से भी अनैतिक सम्बन्ध रखता है । यदि सप्तमेश अपनी नीच राशि में हो और सप्तम में पाप ग्रह हो तो जातक की दो पत्नियां होने की संभावना बलवती होती है ।।
 
मित्रों, यदि सप्तमेश षष्ठ, अष्टम या द्वादश भाव में हो अथवा निर्बल हो या फिर चतुर्थ भाव में हो और लग्नेश यदि अष्टम या द्वादश में हो तो पत्नी की मृत्यु शीघ्र हो सकती है अथवा बिछोह निश्चित हो जाता है । लग्न से या चंद्र लग्न से सप्तम भाव पर शनि और बुध दोनों की दृष्टि हो तो जातक का पत्नी से शीघ्र ही बिछोह हो जाता है ।।
 
सप्तम भाव पर किसी वक्री या पापी ग्रह की दृष्टि हो तो जातक का दांपत्य जीवन कलह एवं कष्टपूर्ण हो जाता है । शुक्र नीच राशि में हो, दशम का स्वामी निर्बल होकर 6-8 या 12वें भाव में हो तो पत्नी की मृत्यु विवाह के बाद शीघ्र ही हो सकती है । शनि-मंगल सप्तम भाव में हो और सप्तमेश शनि की राशि में हो तो जीवन साथी का आचरण संदेहजनक होता है किंतु यदि सप्तमेश शुभ ग्रह हो तो ऐसी कोई बात नहीं होती ।।
 
मित्रों, यदि सप्तमेश शुभ हो तो आप निश्चिन्त रहें आपकी जीवन संगिनी गुणवती और सदाचारिणी पत्नी की भूमिका का निर्वहन करेगी । यदि गुरु सप्तम में हो और लग्नेश बलशाली हो तो भी यही फल होता है । जन्म या विवाह के समय लग्न से, चन्द्रमा से अथवा शुक्र से मंगल की सप्तम और अष्टम भाव में स्थिति वैवाहिक जीवन के लिए अशुभ होती है ।।
 
यदि लग्नेश, सप्तमेश और उस राशि का स्वामी जिसमें सप्तमेश स्थित हो, सशक्त हों और उन पर कोई कुप्रभाव न हो, तो जातक का वैवाहिक जीवन सुखपूर्वक व्यतीत होता है । दांपत्य सुख के लिए सप्तम भाव के साथ द्वितीय भाव का भी बलवान होना आवश्यक है । सप्तम भाव में शुभ ग्रहों की दृष्टि शुभ फलों को बढ़ाती है ।।
 
मित्रों, सप्तम भाव, सप्तमेश एवं कारक ग्रह शुक्र (पुरुष जातक) के लिए गुरु (स्त्री जातक के लिए) पर सूर्य, शनि, राहु का प्रभाव हो तो तलाक हो सकता है । परंतु यदि इनके साथ-साथ नीच ग्रहों का या मंगल का क्रूर प्रभाव हो तो तलाक न होकर जीवनसाथी की मृत्यु हो जाती है । इसके अतिरिक्त यदि पति या पत्नी के सप्तम भाव में विभक्ति कारक ग्रहों का दुष्प्रभाव हो, शुक्र व गुरु भी विभक्ति कारक ग्रहों से युक्त या दृष्ट हों तो तलाक हो सकता है ।।
 
सप्तम भाव नीच ग्रह से प्रभावित हो, शुक्र भी नीच राशि में हो, सप्तमेश या कुण्डली का कारक ग्रह भी नीच राशि का हो तो जातक को कभी भी पत्नी का सुख नहीं मिलता है । ऐसे जातक को जीवन में पत्नी बिछोह सहन करना ही पड़ेता है । सप्तम भाव, सप्तमेश तथा शुक्र तीनों पीड़ित एवं निर्बल हों, शुभ युति या दृष्टि न हो तो जातक को जीवन-साथी का सुख नहीं मिलता ।।
 
मित्रों, लग्नेश नीच का हो, लग्न में बैठा ग्रह नीच राशि का हो, लग्न पर नीच ग्रहों की दृष्टि हो, गुरु, शत्रु नीच ग्रहों के प्रभाव में हो, लग्न में निर्बल चन्द्रमा हो, सप्तम भाव पर नीच ग्रहों की दृष्टि हो तो स्त्री विधवा हो जाती है । इसलिए शादी के करोड़ो के खर्चे में एक ज्योतिषी का फ़ीस और सही ।।
 
परन्तु अपने सुखी जीवन हेतु जीवनसाथी के चयन में ज्योतिष की भूमिका को महत्त्व दें । और ये संसार का सम्पूर्ण सत्य भी है, कि जीवन में ज्योतिष की सर्वाधिक भूमिका होती है । विवाह के बंधन में बंधने से पूर्व किसी योग्य विद्वान ज्योतिषी से सलाह अवश्य लेना चाहिए ।।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

Related Posts

Contact Now