जीवन में रोग एवं सुख तथा सूर्य की अवस्था ।।

जीवन में रोग एवं सुख तथा सूर्य की अवस्था ।। Disease and happiness in the life and the condition of the sun.

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,

मित्रों, बालाजी वेद, वास्तु एवं ज्योतिष विद्यालय सिलवासा में आप सभी का हार्दिक स्वागत है । आज हम बात करेंगे आपकी कुंडली में सूर्य के अवस्था और उसके फल की । सूर्य कुण्डली के किस घर में बैठते हैं और किस अवस्था में होते हैं तो क्या फल देते हैं ।।

आइये देखते है, कि सूर्य अगर शयननावस्था में हो तो जातक मंदाग्नि रोग से पीड़ित होता है । क्षुधा की कमी अर्थात भूख लगने की कमी, पाचन आदि शक्ति में गड़बड़ी, इन सब बातों से ऐसा जातक दुखी होता है । पित्त की विशेषता होती है, गुदा में व्रणआदी रोग होते हैं । हृदय शूल का रोग होता है और उसकी जंघा तथा पैर स्थूल होते हैं ।।

आपकी कुंडली में सूर्य यदि उपवेशन अवस्था में हो तो ऐसा सूर्य जातक को दरिद्र बना देता है । ऐसा जातक दूसरों का भार ढोने वाला, कलह उपस्थित करने वाला, विद्या को जानने वाला, चित्त का कठोर और निर्दयी होता है तथा उसकी संपत्ति नष्ट हो जाती है ।।

मित्रों, सूर्य अगर नेत्रपाणि अवस्था में हो तो ऐसा जातक आनंदमय जीवन व्यतीत करता है । धनवान, बलवान, सुखी, राजा की कृपा से अभिमान से युक्त, विवेकशील तथा परोपकार से युक्त होता है ।।

यदि ऐसा सूर्य अर्थात नेत्रपाणि अवस्था वाला सूर्य नवम भाव में, पंचम भाव में अथवा दशम भाव में बैठा हो तो अत्यंत शुभ फल देता है । अर्थात इन भावों से सम्बन्धित सभी शुभ फलों की पुष्टि अर्थात प्राप्ति होती है ।।

मित्रों, यदि सूर्य आपकी कुंडली में प्रकाशन अवस्था में हो तो जातक का चित्त उदार होता है । धन संपन्न, सभा में चतुराई से बात करने वाला, पुण्यवान, बलवान और सुंदर होता है ।। यदि सूर्य पांचवें, सातवें, 10वें या 12वें स्थान में बैठा हो तो स्त्री तथा पुत्र की हानी हो सकती है ।।

जन्मकुंडली में सूर्य यदि गमनेच्छा अवस्था में हो तो जातक निरुद्यमी, परदेश में रहने वाला, दुखों को भोगने वाला, बुद्धिहीन, गुस्से से भरा हुआ, भय से आतुर रहता है एवं धनहीन भी होता है ।।

मित्रों, गमनावस्था में यदि सूर्य हो तो जातक परस्त्रीगामी एवं निरंतर सफर की इच्छा रखने वाला होता है । सभा अवस्था में सूर्य हो तो जातक परोपकार में तत्पर, धन-रत्न आदि से संपन्न, बहूगुणी, पृथ्वी और मकान आदि का मालिक बलवान उत्तम वस्त्र आदि से सुशोभित एवं कृपाशील होता है ।।

ऐसे लोगों के बहुत से मित्र होते हैं और प्रतिदिन उसके साथ सभी प्रेम से रहते भी हैं । आगम अवस्था में सूर्य हो तो जातक शत्रुओं से कम्पित, कुटिल बुद्धिवाला, चंचल, धर्म-कर्म से रहित, शरीर से दुबला लेकिन मदमस्त और आत्मश्लाघी होता है ।।

मित्रों, भोजन अवस्था में सूर्य हो तो जातक परस्त्रीगमन के कारण धन और अपने बल का सदा ही विनाश करने वाला ही होता है । उसका खाना-पीना भी व्यर्थ हो जाता है, गठिया और वात आदि रोग से पीड़ित होता है अर्थात शरीर के जोड़ों में दर्द होता है । सिर में रोग होता है बुद्धि का कुमार्गगामी होना, अनिष्ट वार्ताओं में रुचि रखने वाला और असत्य भाषण करने वाला होता है । सूर्य यदि नवमस्थ हो तो उसके पुण्य कर्म में अनेक बाधाएं आते रहती है ।।

नृत्यलिप्सा अवस्था में सूर्य हो तो जातक स्वयं विद्वान और विद्वानों से घिरा रहता है । काव्य विद्या में रुचि एवं जानकारी रखने वाला होता है, वाचाल होता है, राजा से आदर पाने वाला और धरती पर एक पूजित व्यक्ति के रुप में प्रतिष्ठित होता है ।।

मित्रों, कुण्डली में सूर्य यदि कौतुक अवस्था में हो तो जातक सर्वदा आनंद से युक्त ज्ञानवान, यज्ञ करने वाला, राज द्वार में रहने वाला, उत्तम काव्य करने वाला और अपने शत्रुओं पर सदा ही भारी पड़ता है प्रबल रहता है ।।

यदि ऐसा सूर्य छठे स्थान में हो तो जातक अपने बैरियों पर अवश्य ही सर्वदा विजय ही प्राप्त करता है । कुण्डली में सूर्य यदि सातवें या आठवें भाव में हो तो जातक के स्त्री-पुत्र की हानि होती है और उसके लिंग में रोग होता है ।।

मित्रों, कुण्डली में सूर्य यदि निद्रा अवस्था में हो तो जातक का नेत्र लाल रंग का होता है और यह रात-दिन नींद से चूर रहता है । ऐसा जातक विदेश में निवास करता है और इसके स्त्री को क्षय रोग होता है साथ ही इसका कमाया गया धन बारंबार नष्ट होते रहता है ।। 


 
(यह लेख "जातक दीपिका" से लिया गया है जिसके लेखक - सुरकान्त झा" जी हैं)

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