जीवित्पुत्रिका व्रत या जिवतिया व्रत, पूजा विधि एवं माहात्म्य ।।

जीवित्पुत्रिका व्रत या जिवतिया व्रत, पूजा विधि एवं माहात्म्य ।। Jivitputrika Vrat Mahatmya And Pooja Vidhi.

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,

मित्रों, हमारे देश में जीवित्पुत्रिका व्रत संतान की मंगल कामना के लिए माताओं-बहनों के द्वारा किया जाता हैं । जीवित्पुत्रिका व्रत निर्जला अर्थात बिना जल के रहकर किया जाता हैं । जिसमें पूरा दिन एवं रात पानी तक नहीं पिया जाता ।।

वैसे छत व्रत की तरह यह व्रत भी तीन दिन तक मनाया जाता हैं । संतान की सुरक्षा, दीर्घायु एवं मेधाविता के लिए इस व्रत को सबसे अधिक महत्व दिया जाता हैं । यह व्रत आज से नहीं अपितु पौराणिक समय से ही इस व्रत को करने की परम्परा चली आ रही हैं ।।

मित्रों, हमारे हिन्दू पंचाग के अनुसार यह व्रत आश्विन मास कृष्ण पक्ष की सप्तमी से नवमी तक मनाया जाता हैं । इस निर्जला व्रत को विवाहित मातायें अपनी संतान की सुरक्षा के लिए करती हैं । खासतौर पर यह व्रत उत्तरप्रदेश, बिहार एवम नेपाल में मनाया ज्यादातर जाता है ।।

इस वर्ष 2017 में यह व्रत 13 सितम्बर, दिन बुधवार को मनाया जायेगा । अष्टमी तिथि की 13 तारीख को रात्रि 01:04 AM पर शुरू हो जाएगी । और 13 सितम्बर को ही रात्रि 22:49 PM पर पूर्ण हो जाएगी ।। सूर्य षष्ठी व्रत की तरह ही यह व्रत भी तीन दिन किया जाता है ।।

तीनो दिन व्रत की विधि अलग-अलग होती है । जैसे प्रथम दिन अर्थात 12 तारीख को नहाय-खाय से इस व्रत की शुरुआत होती है । इस दिन महिलायें नहाने के बाद एक बार शुद्ध भोजन लेती हैं । फिर दिन भर कुछ नहीं खाती अथवा कहीं-कहीं शाम को ही भोजन करती हैं ।।

खर जिवतिया दूसरा दिन होता हैं, इस दिन महिलायें निर्जला व्रत करती हैं । यह दिन विशेष होता हैं इस दिन दिन भर कुछ भी खाना-पीना नहीं होता है । अंतिम अर्थात नवमी को व्रत को खोलना अर्थात पारण होता है । इस दिन कई लोग बहुत सी चीज़े अपनी परम्परा के अनुसार भोजन बनाते हैं और अपने पितरों को खिलाकर फिर खाते हैं ।।

खासतौर पर इस दिन झोर भात, नोनी का साग एवम मडुआ की रोटी आदि-आदि । कहीं-कहीं मडूवा की रोटी दिन के पहले भोजन में ली जाती हैं । इस प्रकार जीवित्पुत्रिका व्रत का यह तीन दिवसीय उपवास किया जाता हैं । यह नेपाल एवम बिहार में बड़े श्रद्धा-भाव से किया जाता है ।।

मित्रों, कहा जाता है, कि एक बार एक जंगल में चील और लोमड़ी घूम रहे थे । तभी उन्होंने मनुष्य जाति को इस व्रत को विधि पूर्वक करते देखा एवम कथा सुनी । उस समय चील ने इस व्रत को बहुत ही श्रद्धा के साथ ध्यानपूर्वक देखा, वहीं लोमड़ी का ध्यान इस ओर बहुत कम था ।।

चील के संतानों एवम उनकी संतानों को कभी कोई हानि नहीं पहुँची लेकिन लोमड़ी की संतान जीवित नहीं बची । इस प्रकार इस व्रत का महत्व बहुत अधिक बताया जाता है । यह कथा महाभारत काल से जुड़ी हुई है । महाभारत युद्ध के बाद अपने पिता की मृत्यु के बाद अश्वत्थामा बहुत ही नाराज था ।।

उसके अन्दर बदले की आग धधक रही थी, जिस कारण उसने पांडवो के शिविर में घुस कर सोते हुए पाण्डवों के पांच पुत्रों को पांडव समझकर मार डाला । उसके इस अपराध के कारण उसे अर्जुन ने बंदी बना लिया और उसकी दिव्य मणि छीन ली ।।

इस बात से क्रुद्ध अश्वत्थामा ने उत्तरा की अजन्मी संतान को गर्भ में मारने के लिए ब्रह्मास्त्र का उपयोग किया । जिसे निष्फल करना लगभग नामुमकिन था । उत्तरा की संतान का जन्म लेना भी आवश्यक था । जिस कारण भगवान श्री कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर उसको गर्भ में ही पुनः जीवित किया ।।

गर्भ में मरकर जीवित होने के कारण उसका नाम जीवित्पुत्रिका पड़ा और आगे जाकर यही राजा परीक्षित बना । तब ही से इस व्रत को किया जाता है । इस प्रकार इस जीवित्पुत्रिका व्रत का महत्व महाभारत काल से ही है ।।

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