चंद्रमा का छ: प्रकार की स्थितियों के अनुसार शुभाशुभ फल ।।

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चंद्रमा का छ: प्रकार की स्थितियों के अनुसार शुभाशुभ फल ।। Chandrama Ka six types Situations Me Shubh Ashubha fal

मित्रों, चंद्रमा की दशा भी छ: प्रकार की बतलाई गई है ।।
आइए बात करते हैं, सबसे पहले कि वो छः भेद क्या है ? मित्रों, साधारण रूप से चंद्रमा की दशा भी उच्च, नीच, मित्र राशि, शत्रु राशि, क्षीणता और पूर्णता के भेद से छ: प्रकार की बतलाई गई है ।।

उच्चस्थ अर्थात वृषभ राशि के चंद्रमा की दशा में उच्च गत चंद्रमा की दशा में राज्य लाभ, नीच में मरण, शत्रुगृह में बंधन, मित्र राशि में स्वजनों से सुख, क्षीणचंद्र की दशा में उदर रोग, ज्वर, मस्तक और नेत्र में पीड़ा होती है ।।
पूर्ण एवं बलवान चंद्रमा यदि आपकी कुंडली में हो और उसकी दशा चल रही हो तो ऐसे पूर्ण चंद्रमा की दशा में स्त्री सुख, सम्भोग सुख अथवा गृहस्थ सुख का संपूर्ण लाभ प्राप्त होता है ।।

Chandrama Ka six types Situations Me Shubh Ashubha fal
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अष्टम भाव में बैठे हुए चंद्रमा की अगर आपकी कुंडली में दशा चल रही हो तो अपने नौकर आदि की हानि, स्वजनों में अपमान, मृत्यु एवं मृत्युतुल्य कष्ट तक होता है ।।
शत्रु के घर में बैठे हुए चंद्रमा यदि आपकी कुंडली में हो और ऐसे शत्रु राशिस्थ चंद्रमा की दशा आपके ऊपर चल रही हो तो उस समय में यन्त्र, तृष्णा, काष्ठ, गोबर, बाँस, करजनी के फल और जल से आजीविका निर्वहन करनी पड़ती है ।।

शत्रु राशिस्थ चंद्रमा की दशा में जातक को कदन्न अर्थात कोदो आदि और कुवस्त्र से गुजारा अर्थात राजा भी हो तो भी ऐसी दशा में उसे भी नौकरी करके जीवन निर्वाह करना पड़ता है ।।

लग्न में बैठे हुए एवं उच्च के तथा केंद्र में बैठे हुए ग्रहों की दशा में जातक प्रांतों का अधिपति होता है तथा केंद्र में बैठे हुए ग्रह की दशा में धन वाहनादि का लाभ प्राप्त होता है ।।
छठे भाव में बैठे हुए ग्रह की दशा में जातक में व्यसनों की वृद्धि हो जाती है । अष्टम भाव में बैठे हुए ग्रह की दशा में मृत्यु एवं अस्त ग्रह की दशा में बंधन से कष्ट होता है ।।

वक्री ग्रह की दशा में नित्य देशाटन, व्यसन एवं शत्रुओं का विरोध झेलना पड़ता है । यह फल पाप ग्रहों के वक्री होने पर होता है, परंतु शुभ ग्रहों के वक्री होने पर भी शुभ फल प्राप्त नहीं होता है ।।

रिक्त ग्रह अर्थात निर्बल ग्रह, अतिरिक्त ग्रह अर्थात सैन्य बल से युक्त ग्रह, नीच ग्रह, परम नीच ग्रह, शत्रु तथा अतिशत्रु के घर में बैठे हुए ग्रहों की दशा में राज्य कुल में उत्पन्न जातक राजा हो कर भी अपने नौकरों का भी नौकर बन जाता है ।।
शत्रु गृहगत ग्रह की दशा में स्थान त्याग, रोगभय, पुनः पतन, उत्थान, शत्रु से कलह, बंधन अर्थात जेल यात्रा भी होता है ।।

रिक्त अर्थात निर्बल ग्रह की दशा जब जन्म कुंडली के अनुसार शुरू होती है तो कहा जाता है, कि ऐसा राजा, जिसके यहां हाथियों के मद से पृथ्वी की धूल भी कीचड़ बन जाती थी, ऐसा राजा भी ऐसे निर्बल ग्रह की दशा में दरिद्र हो जाता है ।।

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