गण्डमूल नक्षत्रों एवं उनके हानि-लाभ के विषय में जानें ।।

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Mrityu Ka Karan Chandra
Mrityu Ka Karan Chandra

गण्डमूल नक्षत्रों एवं उनके हानि-लाभ के विषय में जानें ।। Gandmul Nakshatron Ka Dosh And Shanti Ka Vidhan

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,

मित्रों, हमारे वैदिक ज्योतिष के अनुसार २७ नक्षत्र होते तथा एक अट्ठाईसवां अभिजित नक्षत्र होता है । इन सभी नक्षत्रों में ६ नक्षत्र गण्डमूल नक्षत्रों की श्रेणी में माने गये हैं । हमारे ज्योतिष शास्त्र की मान्यता के अनुसार चन्द्र मण्डल से एक लाख योजन ऊपर नक्षत्र मण्डल है । रेवती-अश्वनी, आश्लेषा-मघा, ज्येष्ठा-मूल यही वो छः नक्षत्र है, जिन्हें गण्डमूल नक्षत्र कहा जाता है ।।

आइये सबसे पहले हम यह जान लेते हैं, कि गण्डमूल किसे कहते हैं ? जहाँ एक राशि और नक्षत्र समाप्त हो रहे हो उसे गण्ड कहते हैं । और जहाँ दूसरी राशि से नक्षत्र का आरम्भ हो उसे मूल कहते हैं । उपरोक्त नक्षत्रों में उत्पन्न जातक-जातिका गण्डमूलक अर्थात सतइसा वाले कहलाते हैं । इन नक्षत्रों में उत्पन्न जातक स्वयं के लिये तथा अपने कुटुम्बी जनों के लिये अशुभ माने जाते हैं ।।

मित्रों, राशि चक्र और नक्षत्र चक्र दोनों में इन ६ नक्षत्रों पर ही संधि होती है । ज्योतिष के आचार्यों के अनुसार इस संधि समय को जितना लाभदायक माना गया है, उतना ही ये हानिकारक भी होता है । संधि क्षेत्र हमेशा नाजुक और अशुभ होते हैं, इसी प्रकार गण्डमूल नक्षत्र भी संधि क्षेत्र में आने से दुष्परिणाम देने वाले हो जाते हैं और राशि चक्र में यह स्थिति तीन बार आती है ।।

हम अगर ध्यान से इन ६ नक्षत्रों पर विचार करें की इनको गण्डमूल की श्रेणी में क्यों रखा गया ? देखिये, आश्लेषा नक्षत्र और कर्क राशि का एक साथ समाप्त होना और यही से मघा नक्षत्र और सिंह राशि का प्रारम्भ होना । ज्येष्ठा नक्षत्र और वृश्चिक राशि का समापन और यही से मूल नक्षत्र और धनु राशि का प्रारम्भ । रेवती नक्षत्र और मीन राशि का समापन और यही से अश्वनी नक्षत्र और मेष राशि का आरम्भ ।।

मित्रों, इसमें तीन गण्ड नक्षत्र हैं, आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती और तीन मूल नक्षत्र हैं, मघा, मूल और अश्विनी । जिस प्रकार एक ऋतु का जब समापन होता है और दूसरी ऋतु का आगमन होता है तो उन दोनों ऋतुओं का परिवर्तन काल स्वास्थ्य के लिये उत्तम नहीं माना गया है । ठीक इसी प्रकार नक्षत्रों, राशियों एवं ग्रहों का स्थान परिवर्तन भी जीवन और स्वास्थ्य के लिये हानिकारक माना गया है ।।

जैसे सूर्य धनु राशि से मकर राशि पर जब 14 या 15 जनवरी को जब जाता है, तो उस दिन को दोषपूर्ण मानकर हम स्नान-दानादि करते हैं । ठीक उसी प्रकार इन उपरोक्त नक्षत्रों को भी दोषपूर्ण माना गया है और इसकी शान्ति का विधिपूर्वक विधान बताया गया है । इन नक्षत्रों में जिनका जन्म हुआ हो उस नक्षत्र की शान्ति हेतु जप और हवन अवश्य करवानी चाहिए ।।

अगर आप विधिपूर्वक यज्ञानुष्ठान आदि नहीं करवा सकते तो इन नक्षत्रों के मन्त्रों का जप उनकी निर्धारित संख्यानुसार करने से भी उनकी शान्ति हो जाती है । अश्विनी के लिये 5000 मन्त्र जप का विधान है जबकि आश्लेषा के लिये 10000 मन्त्र जप करना चाहिये । मघा नक्षत्र के लिये भी 10000 मन्त्र जप करना चाहिये और ज्येष्ठा के लिये 5000 मन्त्र जप करना-करवाना चाहिये ।।

मूल नक्षत्र के लिये 5000 मन्त्र जप का विधान है जबकि रेवती नक्षत्र की शान्ति के लिये भी 5000 मन्त्र जप करना-करवाना चाहिये । इन नक्षत्रों के मन्त्र जप करने के उपरान्त जप का दशांश हवन किसी सुयोग्य विद्वान वैदिक ब्राह्मण से करवाना चाहिये । उसके पहले गौरी-गणेश, नवग्रह, कुल देवता का पूजन, शिव जी का रुद्राभिषेक, नक्षत्र एवं नक्षत्र के स्वामी का पूजन अर्चन करने के बाद दशांश हवन अवश्य करवायें ।।

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।।। नारायण नारायण ।।।

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