बृहस्पति ग्रह के विषय में कुछ विशिष्ट बातें।।

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Guru Graha Ke Vishay Me
Guru Graha Ke Vishay Me

गुरु अर्थात बृहस्पति ग्रह के विषय में कुछ विशिष्ट बातें ।। Guru Graha Ke Vishay Me.

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,

मित्रों, गुरू को काल पुरूष का ज्ञान माना गया है, अतः यह ज्ञान का प्रतीक ग्रह माना जाता है । ग्रह मण्डल में इसे मन्त्री का पद प्राप्त है । इसके वर्ण, रूप, दिशा, प्रकृति, सत्वादि के विषय में इस प्रकार बताया गया है ।।

इसका वर्ण पीत एवं गौर, अवस्था वृद्ध, लिंग पुरूष जाति ब्राहमण, नेत्र भूरे रंग के, स्वरूप स्थूल (भूरे केशयुक्त), आकृति गोल, पद द्विपाद, गुण सत्व, तत्व आकाश, प्रकृति समघात, स्वभाव मृदु एवं क्षिप बताया गया है ।।

इसके धातु चाँदी कुछ मतों के अनुसार स्वर्ण, वस्त्र मध्यम, अधिदेवता इन्द्र, दिशा ईशान, रस मधुर, स्थान ग्राम एवं भूमि, ऋतु हेमन्त एवं इसका रत्न पुखराज है ।।

उदय उभय भाग, क्रीड़ा स्थान भण्डारगृह, काल पूर्वाहन, वेदाभ्यास रूचि वेदान्त एवं व्याकरण, वाहन हाथी, वार गुरूवार, निर्सग बल बुध से अधिक बली, पराभव मंगल से पराहित, प्रतिनिधि पशु अश्व अर्थात घोड़ा ।।

मित्रों, गुरू को जीव, हृदय कोश, चर्बी तथा कफ का अधिपति माना गया है । मनुष्य शरीर में कमर से जंघा तक इसके अधिकार क्षेत्र है में आता है ।।

यह विवेक, बुद्धि, ज्ञान पारलौकिक सुख स्वास्थ्य, आध्यात्मिक, उदारता, धर्म, न्याय, सिद्धान्तवादिता, उच्चाभिलाषा, शान्त स्वभाव, राजनीतिज्ञता पुरोहित मन्त्रित्व, यश, सम्मान, पति का कल्याण, पवित्र व्यवहार आदि के अतिरिक्त धन, सन्तान तथा बड़े भाई का भी प्रतिनिधत्व करता है । यह काम तथा चर्बी की वृद्धि भी करता है ।।

हृदय कोश सम्बन्धी रोग, क्षय, मूर्छा, गुल्म, शोध आदि का इसी से सम्बन्घ माना गया है । गुरू के अशुभ स्थिति में होने पर रोगों की उत्तपति होती है । यह अपनी दशा में कफ तथा चर्बी पर विशेष प्रभाव डालता है ।।

गुरू को स्वर्ण, काँस्य, चना गेंहू, जौ तथा पीले रंग के पुष्प, वस्त्र, फल हल्दी, धनियां, प्याज, ऊन तथा मोम आदि का भी प्रतिनिधि माना गया है ।।

ऊपर जिन व्यक्तियों, अगों पदार्थो, कार्यो तथा विषयों का उल्लेख किया गया है उनके सम्बन्ध में गुरू के द्वारा ही विशेष विचार किया जाता है । इन विषयों में शुभ हो तो शुभ, अशुभ हो तो अशुभ फल देता है ।।

मित्रों, गुरू भी सदैव मार्गी नहीं रहता है, अपितु समय-समय पर मार्गी, वक्री तथा अस्त भी होता रहता है । इसकी स्वराशियां धनु तथा मीन मानी गयी है । यह कर्क राशि के 5 अंश तक परम उच्च का तथा मकर राशि में 5 अंश तक परम नीच का होता है ।।

गुरु धनु राशि के 10 अंश तक मूल त्रिकोणस्थ माना जाता है । यह कर्क, वृश्चिक, कुम्भ तथा तीन राशि, स्व वर्ग गुरूवार उत्तरायण, लग्न में तथा रात्रि एवं दिन के मध्य भाग में अधिक बली होता है । इसकी गणना शुभग्रहों में की जाती है ।।

सूर्य, चन्द्र तथा मंगल ये तीनों ग्रह गुरू के नैसर्गिक मित्र है । बुध तथा शुक्र ग्रह इसके शत्रु ग्रह माने गये है । शनि, राहु तथा केतु से यह समभाव रखता है ।।

गुरू जन्म कुण्डली के जिस भाव में बैठा होता है, वहां से तृतीय तथा दशम भाव को एकपाद दृष्टि से, पंचम तथा नवम भाव को द्विपाद दृष्टि से, चतुर्थ तथा अष्टम भाव त्रिपाद दृष्टि से एवं पंचम, सप्तम तथा नवम भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है ।।

गुरू को पंचम भाव का कारक ग्रह माना जाता है । इसके द्वारा सन्तान, विद्या, धर्म, लाभ, यश, कीर्ति राज-सम्मान, पवित्रता, इन्द्रिय निग्रह तथा पौत्र एवं गुल्म, शोथ आदि रोगों का विचार किया जाता है ।।

यह लग्न में बली तथा चन्द्रमा के साथ रहने पर चेष्टा बली होता है । यह सूर्य के साथ सात्विक, चन्द्रमा के साथ राजस, मंगल के साथ तामस तथा बुध एवं शुक्र के साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार सम्बन्ध रखता है ।।

मित्रों, बृहस्पति का पीत एवं गौर वर्ण, स्थूल-शरीर, बडे उदर, भूरे बाल तथा नेत्रों वाला, कोमल मति, धर्म, नीति, विधि, न्याय, विज्ञान आदि का महापण्डित, परमार्थी, चतुर, क्षिप्त स्वभावी, सत्वगुण सम्पन्न, समदृष्टि युक्त माना जाता है ।।

यह सम्पत्तिदायक, मानवता का हितैषी, ब्राहमण वर्ण, अत्यधिक शुभ तथा समस्त ग्रहों में अत्यन्त बलशाली माना जाता है । यह प्रसन्नता सुख तथा समृद्धि का प्रतीक भी माना गया है ।।

मित्रों, वक्री, अस्त अथवा अतिचारी गुरू अभीष्ट फल नहीं देता । उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषढ़ा, पुनर्वसु, पूर्वाभाद्रपद तथा विशाखा नक्षत्रों में यह शुभ फलदायक होता है । तथा आर्द्रा, स्वाति और शतभिषा नक्षत्रों में अशुभ फलदायक होता है ।।

लग्नस्थ बृहस्पति को लाखों दोष दूर करने वाला माना जाता है । यही बात केन्द्रस्थ गुरू के विषय में भी कही जाती है । यथा – किं कुर्वन्ति ग्रहा: सर्वे यस्य केन्द्रे बृहस्पति ।।

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