सुखों से भर देता है गुरु में शनि की अन्तर्दशा।।

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Guru Me Sani ki Antar Dasa
Guru Me Sani ki Antar Dasa

सभी सुखों से भर देता है गुरु में शनि की अन्तर्दशा।। Guru Me Sani ki Antar Dasa.

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,

मित्रों, अभी हम कुछ दिनों से चर्चा कर रहे हैं, गुरु की महादशा में गुरु की ही अन्तर्दशा के विषय में की जातक के जीवन में यह समय कैसा रहता है ? ये गुरु और शनि मिलकर जातक को क्या और किस प्रकार का फल देते हैं ।।

महर्षि पराशर कहते हैं, कि – जीवस्यान्तर्गते स्वोच्चे स्वक्षेत्रमित्रगे शनौ । लग्नात्केन्द्रत्रिकोणस्थे लाभे वा बलसंयुते ।।८।। राज्य्लभ महत्सौख्यं वस्त्राभरणसंयुतम् । धन-धान्यादिलाभं च स्त्रीलाभं बहुसौख्यकृत् ।।९।।

अर्थात् – गुरु की दशा हो और अपने उच्च में, अपने घर में, या अपने मित्र के घर में, लग्न से केन्द्र, त्रिकोण अथवा लाभ भाव में बलवान शनि हो और उसकी अन्तर्दशा चल रही हो तो जातक को राज्य का लाभ, महान सुख, वस्त्राभूषण आदि का भरपूर लाभ, धन-धान्य, स्त्री एवं अनेक सुखों की प्राप्ति होती है ।।

वाहन, पशु, भूमि एवं स्थान का लाभ होता है । पुत्र-मित्र आदि का सुख और मनुष्य की सवारी का लाभ (नरवाहनयोगकृत्) होता है । भूमि-भवन-जायदाद का सहज लाभ एवं पश्चिम दिशा की यात्रा से लाभ तथा राजा से मिलने से लाभ-ही-लाभ होता है ।।

ऐसे जातक को अनेक प्रकार के वाहन का लाभ होता है । लग्न से ६/८/१२वें घर में शनि हो अस्त हो, नीच का हो अथवा शत्रु के घर का हो तो धन-धान्यादि का नाश, ज्वर से पीड़ा, मानसिक कष्ट एवं ब्रण रोग से जातक अत्यधिक दु:खी होता है ।।

घर में कोई भी शुभ कार्य होने नहीं पाता है एवं नौकरों को भी कष्ट होता है । जातक के पशुधन को भी कष्ट होता है एवं बन्धुओं से द्वेष होता है । शनि यदि दशमेश से केन्द्र, त्रिकोण, लाभ अथवा धन भाव में हो तो जातक को भूमि का लाभ एवं पुत्र सुख प्राप्त होता है ।।

गौ, भैंस, का लाभ एवं किसी शुद्र के द्वारा धन का लाभ होता है । दशमेश से यदि ६/८/१२वें घर में शनि किसी पाप ग्रह से युत हो तो धन-धन्य का नाश, मित्रों से विरोध,उद्योगहीन, शरीर में कष्ट, और स्वजनों से भय होता है ।।

मित्रों, यदि कुण्डली में दुसरे अथवा सातवें घर का मालिक ग्रह शनि हो तो अपमृत्यु का भय होता है । इसकी शान्ति के लिये प्रतिदिन विष्णुसहस्रनाम का पाठ कालि गाय अथवा भैंस का दान करना चाहिये इससे अयोग्यता एवं आयुष्य की प्राप्ति होती है ।।

यथा – द्विसप्तमाधिपे मंदे ह्यपम्रित्युर्भविष्यति ।।१८।। तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुसाहस्त्रकं जपेत् । कृष्णां गां महिषीं दद्याद्दानेनारोग्यमादिशेत् ।।१९।। (बृह.प.हो.शा. अन्तर्दशा.वि.अध्यायः श्लो-१८-१९.)

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