बुध सत्ता में उच्च पदस्थ करता है।।

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leadership and Budh
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बुध सत्ता और शाशन में भी आपको उच्च पदस्थ करता है, कैसे आइये जानें ।। leadership and Budh.

हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,

मित्रों, आज बुधवार है, तो बुध से सम्बन्धित लेख ही आपलोगों के सम्मुख उपलब्ध है । सबसे पहले ये जान लेते हैं, कि बुध की उत्पत्ति कैसे हुई ? चंद्रमा द्वारा बृहस्पति की पत्नी तारा के द्वारा उत्पन्न बालक ही बुध ग्रह के रूप में प्रतिष्ठित हैं । चन्द्रमा द्वारा अपहृत तारा ने ब्रह्मा जी के पूछने पर तारा ने स्वयं उसे चंद्रमा का पुत्र होना स्वीकार किया था । तब स्वयं ब्रह्मा जी ने ही उस बालक को चंद्रमा को दे दिया था । चंद्रमा के पुत्र होने के कारण बुध को क्षत्रिय माना जाता है ।।

चन्द्रमा ने बुध के पालन-पोषण का दायित्व अपनी प्रिय पत्नी रोहिणी को दिया था । रोहिणी द्वारा पालन-पोषण किए जाने के कारण बुध का नाम रौहिणेय भी है । पद्म पुराण में उल्लेख है कि बुध ने हस्ति शास्त्र का निर्माण किया । बुध का रूप कितना अधिक मोहक है कि बृहस्पति अपना संपूर्ण क्रोध भूल गए तथा उन्हें पुत्र रूप में स्वीकार करने को तत्पर हो गए थे । बुध की कांति-नवीन दूब के समान बताई गई है इसलिये बुध के स्वरूप में एक आकर्षण भी है ।।

मित्रों, बुध की कृपा जिन व्यक्तियों पर होती है उनके व्यक्तित्व में ऎसा आकर्षण सहज ही पाया जाता है । चंद्रमा के पुत्र होने तथा बृहस्पति द्वारा पुत्र माने जाने के कारण स्वयं के गुणधर्म के अतिरिक्त बुध पर इन दोनों ग्रहों का प्रभाव भी स्पष्टत: देखने को मिलता है । चन्द्रमा और बृहस्पति के आशीर्वाद के कारण ही बुध के अधिकार क्षेत्र में आने वाले विषय विस्तृत हैं । गंधर्वराज के पुत्र होने के कारण ललित-कलाओं पर भी बुध का अधिकार है ।।

वहीं बृहस्पति के प्रभाव से विद्या, पाण्डित्य, शास्त्र, उपासना आदि बुध के प्रमुख विषय भी हैं । अभिव्यक्ति की क्षमता भी बुध का ही क्षेत्र माना जाता हैं । आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में सफलता के लिए जिस प्रस्तुतिकरण अर्थात प्रेजेंटेशन की आवश्यकता होती है वह सिर्फ बुध ही देता है । अन्य ग्रह जैसे चन्द्रमा, शुक्र, बृहस्पति, कला, विद्या, कल्पनाशक्ति प्रदान करते हैं । परन्तु यदि जन्मपत्रिका में बुध बली न हो तो अपनी प्रतिभा का आर्थिक लाभ उठाने की कला से व्यक्ति वंचित रह जाता है ।।

मित्रों, बुध की कुल महादशा 17 वर्ष की होती है । इसके अन्तर में नवग्रहों की अन्तर्दशायें आती हैं । सबसे पहली अन्तर्दशा बुध में बुध की ही आती है । तो आइये बुध की महादशा में बुध की अन्तर्दशा का फल जानने का प्रयास करते हैं । यदि जन्मकुण्डली में बुध कारक हो, उच्च राशि, स्वराशि, मित्रराशि का अथवा अपने वर्ग में बलवान हो तो अपनी दशा-अन्तर्दशा में शुभ फल प्रदान करता है ।।

जातक इस काल में निरोगी और स्वस्थ्य शरीर का मालिक बना रहता है । बुद्धि का विकास और उच्च शिक्षा की प्राप्ति में सहयोगी होता है । परीक्षार्थी थोड़े श्रम से ही परीक्षा में उच्चतम अंक प्राप्त कर लेते हैं । इस दशा में गणित एवं विज्ञान के विद्यार्थी विशेषत: लाभान्वित होते हैं । अगर जातक कोई व्यवसायी हो तो उसका व्यवसाय चारो दिशाओं फैलता चला जाता है । विशिष्ट ज्ञान, परिजनों से मिलन एवं प्रत्येक कार्य में सफलता तथा सत्ता में सम्मान दिलाता है ।।

मित्रों, परन्तु यह बुध अकारक, नीच, अस्त एवं वक्री हो तो इसकी अन्तर्दशा में विद्यार्थियों को विशेषत: अशुभ फल देता है । विविध रोगों से पीड़ा, स्वजनों से विरोध, कार्यों में असफलता तथा वातशूल से शारीरिक पीड़ा देता है । कोर्ट-कचहरी के चक्कर में अकारण धन का व्यय होता है । जिसकी जन्मकुण्डली में बुध अशुभ होता है, उस जातक को इसकी अन्तर्दशा में बहुत ही कष्ट झेलने पड़ते हैं ।।

इसके बाद बुध की महादशा में केतु की अन्तर्दशा आती है । जन्मकुण्डली में यदि केतु शुभ राशि का हो एवं शुभ ग्रहों से युक्त हो तो अपनी अन्तर्दशा आने पर जातक को थोड़ा ही सही पर धन का लाभ करवाता है । सामान्य विद्या का लाभ भी करवाता है, कुछ कीर्ति भी देता है परन्तु चौपाया जानवरों से अच्छा-ख़ासा लाभ दिलाता है । जातक भ्रातृवर्ग से स्नेह रखता है और उनको सहयोग भी देता है । इतना ही नहीं तीर्थ स्थलों का भ्रमण एवं तीर्थदर्शन का अवसर भी देता है ।।

मित्रों, यदि केतु अशुभ हो और उसकी अन्तर्दशा आये तो जातक की चित्तवृत्ति अस्थिर होकर मन में मलिनता आ जाती है । विद्यार्थी वर्ग अथक परिश्रम के बाद भी परीक्षा में उतीर्ण होने में कठिनाई का अनुभव करते हैं । बन्धु-बांधवों से कलह होती है, मुकदमों में हार तथा शत्रु प्रबल होकर कष्टदायक होते हैं । अग्नि, विष, शस्त्रादि से कष्ट, समाज में निरादर, उदर पीडा, हैजा, चेचक और मन्दाग्नि रोग से पीडा होती है ।।

तीसरी शुक्र की अन्तर्दशा होती है, और यदि शुक्र लग्न, केन्द्र, त्रिकोण एवं आय स्थान में होकर उच्च का हो, बलवान हो तो शुक्र की अन्तर्दशा में जातक यदि विद्यार्थी हो तो साधारण श्रम से ही परीक्षा में उत्तम अंकों से उतीर्ण होता है । जातक विद्यानुरागी हो तो ख्याति भी अर्जित करता है । इस समय में जातक धर्म-परायण होकर कथा-कीर्तन आदि से पुण्य संचय करता है साथ ही अपनी इष्टसिद्धि, भूमिलाभ एवं खूब धनार्जन करता है ।।

मित्रों, इस समय में शुभ और मंगल कार्य होते हैं, जातक शासन-सत्ता में प्रतिष्ठा पाकर विद्धत् समाज में अनेकों पुरस्कार प्राप्त करता है । तरह-तरह के श्रेष्ठ वाहनों का स्वामी, अतिथि, दीन, सेवक तथा स्त्रियों का सम्मान करने वाला होता है । परन्तु यदि शुक्र कुण्डली में अशुभ हो तो उसकी अन्तर्दशा में जातक का कामावेग बढ़ जाता है और दुष्टों की संगति से समाज में बदनामी होती है । ऐसा शुक्र यदि बुध से अष्टम हो तो उसके पत्नी की मृत्यु अथवा मृत्युतुल्य कष्ट, अष्टमेश हो तो उसको ही मृत्युतुल्य कष्ट अथवा दुर्घटना और रोग जैसे सर्दी-जुकाम आदि से कष्ट होता है ।।

बुध में चौथी अन्तर्दशा सूर्य की होती है । मित्रों, यदि कुण्डली में सूर्य कारक, वर्ग में बली हो अथवा केन्द्र या त्रिकोण में हो एवं शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो इसकी अन्तर्दशा में जात्तक के व्यवसाय में अकल्पनीय वृद्धि होती है । पैतृक सम्पति की प्राप्ति एवं थोडे से प्रयत्न से ही सभी मनोकामनाओं की पूर्ति हो जाती है । सोने, चाँदी एवं रत्नों के व्यवसाय से लाभ मिलता है और यदि सरकारी कर्मचारी हो तो पदोन्नती तथा इस समय में वेतनवृद्धि और स्थान परिवर्तन के योग भी बनते हैं ।।

मित्रों, पत्नी के कारण मन में आध्यात्म ज्ञान की जिज्ञासा उत्पन्न होती है । जिसके वजह से तीर्थाटन और सत्कथा श्रवण, विद्वानों, साधुओं का सत्संग प्राप्त होता है । परन्तु अशुभ सूर्य की अन्तर्दशा में जातक में क्रोधावेग बढ़ जाता है । जिसके कारण मन में ईर्ष्या और द्वेष की उत्पति होती है । चोर, अग्नि एवं शस्त्र से पीडा सम्भव होती है । पित्त आदि की अधिकता के कारण शरीर में अनेक रोग होने की सम्भावनायें प्रबल हो जाती है ।।

पांचवी बुध में चन्द्रमा की अन्तर्दशा होती है जो एक वर्ष, पांच माह की होती है । यदि कुण्डली में चन्द्रमा बली या योगकारक हो अथवा बृहस्पति की शुभ दृष्टि के प्रभाव में हो, किसी केन्द्र या त्रिकोण में हो तो चन्द्रमा की शक्ति बढ़ जाती है और यह दशा शुभ फलदायक हो जाती है । धन कमाने के एक से अधिक साधन प्राप्त होते हैं । जीवन साथी या संतान की प्राप्ति होती है । परन्तु चन्द्रमा यदि वृश्चिक राशि में नीच का हो या अमावस्या अथवा कृष्णपक्ष का हो तो हर कार्य में असफलता हावी हो जाती है । उसकी चिन्ता एवं दुर्बलता बढ़ जाती है साथ ही उसके मित्र एवं पार्टनर से भी धोखा ही मिलती है ।।

मित्रों, बुध के विषय में और भी गहन अध्ययन हम आगे के अपने लेखों में करेंगे । साथ ही बुध की महादशा में बाकि के मंगल, राहू, गुरु और शनि की अन्तर्दशा का विस्तृत रूप से अध्ययन हम अपने आगे के लेखों में करेंगे । बुध एक सौम्य ग्रह है और इसे राजकुमार भी कहा जाता है । बुध की दशा में अन्य ग्रहों की अन्तर्दशा अपने-अपने स्वभाव के अनुसार शुभाशुभ फल जातक को प्रदान करते हैं, इस विषय में भी हम विस्तृत चर्चा करेंगे ।।

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