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चन्द्र निर्मित अतुलनीय धनयोग।।

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Chandra And Atulniya Dhan Yoga
Chandra And Atulniya Dhan Yoga

चन्द्रमा द्वारा निर्मित कुछ अतुलनीय धनदायक योग।। Chandra And Atulniya Dhan Yoga.

हैल्लो फ्रेंड्सzzz.

मित्रों, नवग्रहों में चन्द्रमा को सर्वाधिक शुभ ग्रह माना गया है । चन्द्रमा हमारी पृथ्वी का सबसे नजदीकी ग्रह भी है अत: इसका प्रभाव भी हम मनुष्यों पर जल्दी होता है ।।

जन्म कुण्डली में चन्द्र जिस राशि में बैठा होता है वही व्यक्ति का राशि माना जाता है । चन्द्र राशि का महत्व लग्न के समान ही होता है । फलादेश करते समय लग्न कुण्डली के समान ही चन्द्र कुण्डली का भी प्रयोग करना चाहिये ।।

मित्रों, वैसे चन्द्रमा कई प्रकार के योगों का भी निर्माण करता है । जिनमें से कुछ योग शुभ फल देते हैं तथा कुछ अशुभ फलदायी भी होते हैं ।।

#Chandra And Atulniya Dhan Yoga

आज हम इसी विषय पर विस्तृत चर्चा करने जा रहे हैं । चन्द्रमा द्वारा निर्मित योगों में सर्वाधिक चर्चित योग “गजकेशरी योग” है । जिसपर सर्वप्रथम आइये हम कुछ विशेष बातें करते हैं ।।

मित्रों, वैसे तो बृहत्पाराशर होराशास्त्रम् के आधार पर मैंने बहुत पहले ही विस्तार से “गजकेशरी योग” के विषय में लिख रखा है । आप ब्लॉग के सर्च बॉक्स में गजकेशरी योग लिखकर सर्च कर सकते हैं ।।

फिर भी आज इस योग के विषय में कुछ और बातें बताते हैं । चन्द्रमा द्वारा निर्मित शुभ योगों में गजकेशरी योग काफी जाना-पहचाना नाम है । यह योग गुरू चन्द्र के सम्बन्ध से बनता है ।।

मित्रों, जब चन्द्रमा से गुरु किसी जन्म कुण्डली में केन्द्र स्थान में यानी 1, 4, 7 एवं 10 में हो अथवा गुरू चन्द्र की युति इन भावों में हो तो गजकेशरी योग बनता है ।।

सामान्यतया इस योग से प्रभावित व्यक्ति ज्ञानी होता हैं । ऐसे जातकों में विवेक तथा दया की भावना होती है । आमतौर पर इस योग वाले व्यक्ति उच्च पद पर कार्यरत होते हैं । अपने गुणों एवं कर्मों के कारण मृत्यु के पश्चात् भी इनकी ख्याति बनी रहती है ।।

मित्रों, दूसरा चन्द्रमा से निर्मित होनेवाला योग है “सुनफा योग” । जन्म कुण्डली में जिस भाव में चन्द्र होता है उससे दूसरे घर में कोई ग्रह बैठा हो तो सुनफा योग बनता है ।।

#Chandra And Atulniya Dhan Yoga

इस योग में राहु केतु एवं सूर्य का विचार नहीं किया जाता है यानी चन्द्र से दूसरे घर में इन ग्रहों के होने पर सुनफा योग नहीं माना जाता है ।।

मित्रों, इस योग में चन्द्रमा से दूसरे घर में शुभ ग्रह हों तो योग उच्च स्तर का होता है । एक शुभ तथा दूसरा अशुभ ग्रह हों तो इसे मध्यम दर्जे का माना जाता है । परन्तु यदि दोनों अशुभ ग्रह हों तो निम्न स्तर का सुनफा योग बनता है ।।

यह योग जिस स्तर का होता है उसी के अनुरूप व्यक्ति को इसका लाभ मिलता है । जिनकी कुण्डली में यह योग होता है वह सरकारी क्षेत्र से लाभ प्राप्त करते हैं तथा ऐसे जातक उच्च कोटि के धनवान होते हैं ।।

मित्रों, तीसरा “अनफा योग” होता है जो चन्द्रमा के द्वारा निर्मित होता है । सुनफा योग की भांति ही अनफा योग में भी सूर्य को गौण माना जाता है यानी सूर्य से इस योग का विचार नहीं किया जाता है ।।

अनफा योग कुण्डली में तब बनता है जब जन्म कुण्डली में चन्द्र से बारहवें घर में कोई ग्रह बैठा होता है । ग्रह अगर शुभ हो तो योग प्रबल होता है, चन्द्र से बारहवें घर में अशुभ ग्रह होने पर योग कमज़ोर होता है ।।

इस योग से प्रभावित व्यक्ति उदार एवं शांत प्रकृति का होता है । नृत्य, संगीत एवं दूसरी कलाओं में इनकी अत्यधिक रूचि होती है । सुख-सुविधाओं में रहते हुए भी इस जातक का वृद्धावस्था में मन विरक्त हो जाता है तथा योग एवं साधना इसे पसंद आती है ।।

मित्रों, “दुरूधरा योग” भी इसी श्रेणी में आता है । चन्द्र की स्थिति से दुरूधरा योग तब बनता है जब चन्द्र जिस भाव में हो उस भाव से दोनों तरफ कोई ग्रह बैठा हो ।।

#Chandra And Atulniya Dhan Yoga

यहाँ ध्यान रखने वाली बात यह है कि दोनों तरफ में से किसी ओर सूर्य नहीं होना चाहिए । अगर चन्द्र के दोनों तरफ शुभ ग्रह होंगे तो योग अधिक शक्तिशाली होता है ।।

मित्रों, एक ग्रह शुभ दूसरा अशुभ हो तो मध्यम दर्जे का योग बनता है तथा इसी प्रकार दोनों तरफ अशुभ ग्रह यदि हों तो योग निम्न स्तर का हो जाता है ।।

वैसे दुरूधरा योग के विषय में यह कहा जाता है कि इससे प्रभावित व्यक्ति अत्यन्त समृद्धशाली होता है । इन्हें भूमि एवं भवन का सुख सहज ही प्राप्त हो जाता है ।।

मित्रों, चन्द्रमा के संयोग से कुछ अशुभ योगों का भी निर्माण होता है, जैसे “केमद्रुम योग” । यह योग जन्मपत्री में तब बनता है जब चन्द्रमा के दोनों तरफ के भाव में कोई ग्रह ही नहीं हो ।।

इस योग के विषय में माना गया है कि इससे प्रभावित व्यक्ति का मन अस्थिर रहता है । असामाजिक कार्यों में इस जातक का मन लगता है । तथा इसके जीवन में काफी उतार-चढ़ाव भी बना रहता है ।।

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घर में किस प्रकार का कछुआ कहाँ किस दिशा में और क्यों रखना चाहिए – वास्तु टिप्स ।।

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Lord-Rama-and-Lord-Shiva

घर में किस प्रकार का कछुआ कहाँ किस दिशा में और क्यों रखना चाहिए – वास्तु टिप्स ।। Kachhuaa Kahan Kis Disha Me Rakhen.

हैल्लो फ्रेंड्सzzz.

मित्रों, संसार में जितने तरह के लोग हैं, उतने प्रकार के तर्क भी हैं। मैं आज सुबह अपने एक मित्र के घर पर गया । वहां उनके घर में एक जीवित कछुआ था जो चल भी रहा था । उन्होंने मुझसे कहा – गुरूजी ! आप तो वास्तु विशेषज्ञ हैं । इसके बारे में आपका क्या ख्याल है ?

मैंने उनको बताया की देखिये हमारे वैदिक सनातन पद्धति में कोई भी विषय अकारण नहीं है । लेकिन हर विषय की एक सीमा होती है । स्वार्थ और लालच में पड़कर किसी भी सीमा का उल्लंघन मैं नहीं समझता की फलदायी हो सकता है ।।

हमारी ही विद्या को लोगों ने चुराकर हमें ही बेचना शुरू कर दिया और हमारे ही लोग हमारी ही विद्या की उपेक्षा करते हैं और उन्हें अपनाते हैं । मैंने पूछा इस विषय में आपका क्या ख्याल है ? तो वो चुप हो गए ।।

अभी मैं बैठा था तो मुझे लगा की इस विषय पर समाज में फैले इस भ्रम के विषय में कुछ कहना आवश्यक है । तो इस विषय में मेरे विचार ये है, कि किसी भी प्राणी को अपने स्वार्थ और लालच के वजह से बन्दी बनाना अच्छी बात नहीं है । इससे मुझे लगता है, कि फायदे के जगह नुकशान झेलना पड़ सकता है ।।

हाँ कुछ ऐसे प्राणी हैं, जिन्हें हम मानवों का संगत अच्छा लगता है । और जिन्हें हमारे पूर्वज ऋषियों ने अपने पास पालतू बनाकर रखने की अनुमति भी दी है । लेकिन स्वार्थ और लालच से पूर्ण कोई भी ऐसा उद्देश्य व्यक्ति को फायदा नहीं दे सकता ।।

मित्रों, चलिए कछुए की बात कर लेते हैं क्यों रखना चाहिए घर में कछुआ ? सर्व प्रथम आपलोगों को ये बता दूँ कि संसार में जितने प्राणी पाये जाते हैं उनमें से कछुए की उम्र सबसे ज्यादा होती है । और जैसे जैसे कछुए की उम्र बढ़ती जाती है वैसे वैसे कछुए का आकार भी बड़ा होते जाता है ।।

इसीलिए कछुए को अपने घर में धन और व्यापार की नित्य वृद्धि के लिए हमारे शास्त्रों में इसे धन और व्यापार की दिशा उत्तर दिशा में ही रखने को बताया गया है । उत्तर दिशा में कछुआ रखने से हमारे घर में धन की और व्यापार में नित्य सहजता से वृद्धि होती रहती है ।।

कछुए का ऊपरी हिस्सा कठोर होता है, जो स्थायित्व का प्रतिक है । इसलिए ऐसी मान्यता है, कि कछुए को घर में रखने से इसके प्रभाव हमारे धन और हमारी प्रतिष्ठा में स्थायित्व आता है । हमारे जीवन के सभी पक्षों में स्थायित्व आये इसलिए हमें अपने घर में कछुआ रखना चाहिए ।।

कछुआ एक ऐसा प्राणी होता है, जो विपरीत परिस्थिति आने पर अपने आपको समेट लेता है और जब परिस्थिति अनुकूल होने लगती है तब फिर से सक्रिय हो जाता है । इसका अभिप्राय ये है, कि जब हमारे जीवन में हमारे व्यापार में प्रतिकूलता आती है, तो ये कछुआ हमें धैर्य देता है और परिस्थिति के अनुकूल होते ही ये हमें आगे बढ़ने का मार्ग सहज बना देता है । इसलिए अपने घर में कछुए को रखकर हमें जीवन जीने का तरीका भी समझ में आ जाता है ।।

कैसा और किस प्रकार का कछुआ अपने घर में रखना चाहिए ? आप अपने घर में चाँदी के हलके गहरे तथा छिछले जैसे प्लेट में हल्का पानी रखकर पंचधातु का बना हुआ कछुआ अपने घर में रखा सकते हैं । हल्का चाँदी मिलाकर बनाया हुआ पारद का कछुआ आप अपने घर में रख सकते हैं ।।

स्फटिक का कछुआ जिसपर श्रीयन्त्र बना हुआ हो, अगर ऐसा कछुआ मिले तो आप अवश्य अपने घर के पूजन स्थल पर किसी चाँदी के प्लेट में अष्टगंध भरकर उसके ऊपर स्थापित करें । आपके जिन्दगी की दशा एवं दिशा ही बदल जाएगी ।।

Lord-Ram-and-Sita
अगर धनतेरस पर आपको कुछ न कुछ खरीदना ही है तो शुद्ध स्फटिक का विशिष्ट रूप से श्री विद्या के द्वारा सिद्ध किया गया श्री यन्त्र क्यों न खरीदें ? जो माता महालक्ष्मी का साक्षात् स्वरूप भी है, जिसे आपके घर दीपावली में आने से साक्षात् माता महालक्ष्मी की पूर्ण कृपा आने की संभावनाएं हैं ।।

तो आज ही अपना आर्डर लिखवाएं श्री यन्त्र का । ताकि आपका श्रीयन्त्र धनतेरस के दिन सिद्ध करके तैयार हो जाय । ताकि उसे आप धनतेरस अथवा दीपावली को अपने घर विराजमान करवा सकें ।।
श्री यन्त्र के विषय में अधिक जानने के लिए इस लिंक को क्लिक करें – http://www.sansthanam.com/shree-yantram.php

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  ।।। नारायण नारायण ।।।

मृत्यु एवं मृत्युतुल्य कष्ट देता है यहाँ का सेप्टिक टैंक।।

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Aaj ka Panchang 18 July 2019
Aaj ka Panchang 18 July 2019

मृत्यु एवं मृत्युतुल्य कष्ट दे सकता है आपके घर, ऑफिस, बिल्डिंग एवं आपके फैक्ट्री में बना आपका सेप्टिक टैंक।। Septic tank Ka Sahi direction.

हैल्लो फ्रेंड्सzzzzz.

मित्रों, कुछ दिनों पहले एक घर में वास्तु देखने का अवसर मिला । मैंने वहां आवश्यकता से अधिक नकारात्मकता (निगेटिविटी) का अनुभव किया । सभी लोग दुःखी नजर आ रहे थे और उन सभी के दुःख का मुख्य कारण कुछ महीनों पहले परिवार के युवा लडके की अकस्मात मृत्यु थी । मैंने पुरे घर में घूम-घूमकर घर के वास्तु का निरिक्षण किया तो मुझे कुछ वास्तु दोष स्पष्ट रूप से दिखायी दिया ।।

पहले तो मैंने देखा कि ईशान कोण में बहुत बड़ा सेप्टिक टैंक बना हुआ था, जो बहुत बड़ा दोष वास्तुशास्त्र के अनुसार माना गया है । जहाँ भी जिस घर में भी ईशान कोण में सेप्टिक टैंक मैंने देखा है, वहां इस तरह की परेशानियाँ अक्स़र मैंने देखी है । और यह अक्सर घर के पुरुषों के लिए दोषपूर्ण होता है तथा वहाँ के युवावर्ग अपमृत्यु के शिकार होते हुए भी अक्सर देखे गये हैं ।।

मित्रों, ईशान कोण में बने सेप्टिक टैंक की वजह से घर में बीमारी, एक्सीडेंट, आपरेशन या अकस्मात मृत्यु की सम्भावना बनती है । सत्य मानना मित्रों, ईशान कोण में सेप्टिक टैंक अगर आपके घर, बिल्डिंग, फैक्ट्री अथवा आपके किसी भी प्रकार के निवास स्थान बनवाने से पहले इस बात का ध्यान अवश्य रखें अन्यथा इस दोष के वजह से घर में पुरुषों की संख्या धीरे धीरे कम होना शुरू हो जाता है ।।

उस बंगलो में मुझे एक दूसरा और बड़ा गम्भीर दोष दिखा – नैऋत्य कोण में एक बोर था । मित्रों, अगर पानी के लिए खोदा गया कुआँ, किया गया बोर अथवा बोरवेल नैऋत्य कोण में हो तो अक्सर इसका दु:ष्प्रभाव ही देखा गया है, जैसे – मृत्यु या मृत्युतुल्य कष्ट । उक्त मित्र के यहाँ ये दोनों दोष अपना काम कर रहे थे और घर में अचानक घर के चिराग की मौत से सबको एकदम से सदमे में डाल दिया था ।।

मैंने उन्हें निर्देश दिया, की सेप्टिक टैंक को वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) में बनवायें तथा नैऋत्य कोण में जो बोर है, उसमें रेत डालकर पूरी तरह से बंद करने को बोला । घर का पूरा दीवाल रुखड़ा-उखड़ा सा था, जो घर मायूसी पैदा कर रहा था, मैंने कहा पुरे घर को तत्काल सफेद और पीले कलर से पेन्टिंग करवाओ । छत से जगह जगह पानी का सींड लगा था जो नकारात्मक उर्जा का सबसे बड़ा स्रोत माना गया है ।।

मैंने उनको और भी कुछ वास्तुशास्त्र के हल्के और प्रभावी टिप्स बताये । जैसे – घर में लगे गहरे रँग के पर्दों को निकलवाकर हल्के रंग के पर्दे लगाने को कहा । पूर्व और दक्षिण दिशा में अशोक के बड़े बड़े पेड़ सूर्य के प्रकाश को पूरी तरह से रोक रहे थे । इसलिए सभी बड़े पेड़ों को उपर से काटने एवं सूर्य की उर्जा को बेरोकटोक घर में प्रवेश करवाने को बोला ।।

घर में दिन भर चाहे वो किसी मन्त्र, चालीसा, स्तोत्रों के केसेट लगाकर या फिर किसी भी तरह के धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-पाठ के माध्यम से ही सही घर की उर्जा को बढ़ाने की आवश्यकता है । लोगों ने हमारी बात मानी, जिसका परिणाम कुछ ही दिनों में दिखने लगा, घर के लोग फिर से अपने कार्यों में रूचि लेने लगे और पुरानी बातों को भूलने लगे ।।

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अथ श्री नारायण हृदय स्तोत्रम् ।। (नारायणहृदयम्) ।।

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बिना नारायण की प्रीति के लक्ष्मी की प्रशन्नता नहीं मिल सकती ।। (यथा- नारायणस्य हृदयं सर्वाभीष्ट-फलप्रदम् । लक्ष्मीहृदयकं स्तोत्रं यदि चैतद्विनाकृतम् ॥३०॥) हर प्रकार के अभीष्ट की सिद्धि हेतु नारायण हृदय स्तोत्र का पाठ करें । क्योंकि इसके बिना लक्ष्मी हृदय स्तोत्र के परायण से भी लक्ष्मी नहीं आती ।
                              ॥ श्रियै नमः ॥

                  ॥ श्रीमते नारायणाय नमः ॥

मित्रों, हर प्रकार के अभीष्ट की सिद्धि हेतु नारायण हृदय स्तोत्र का पाठ करें । क्योंकि इसके बिना लक्ष्मी हृदय स्तोत्र के परायण से भी लक्ष्मी नहीं आती । स्पष्ट है, कि बिना नारायण की प्रीति के लक्ष्मी की प्रशन्नता नहीं मिल सकती ।। (यथा- नारायणस्य हृदयं सर्वाभीष्ट-फलप्रदम् । लक्ष्मीहृदयकं स्तोत्रं यदि चैतद्विनाकृतम् ॥३०॥)

इसके परायण अथवा पाठ का नियम ये हैं, कि भगवान नारायण के कच्छप अवतार (यथा- तदुपरि कमठं तत्र चानन्तभोगी) की प्रतिमा स्थापित करके ध्यान करते हुए सूर्यवार अथवा गुरुवार को यथाविधान-यथा उपलब्ध सामग्री के अनुसार उनका पूजन करें ।।

उसके बाद पहले नारायण हृदय का एक परायण करें । फिर लक्ष्मी हृदय का परायण करें, इसी क्रम से छः परायण नारायण हृदय का एवं पाँच परायण लक्ष्मी हृदय स्तोत्र का करें अर्थात कुल ग्यारह परायण ।। (यथा- लक्ष्मीहृदयकं स्तोत्रं जपेन्नारायणं पुनः । पुनर्नारायणं जप्त्वा पुनर्लक्ष्मीनुतिं जपेत् ॥३३॥) & (यथा- प्रार्थनादशकं चैव मूलष्टकमथःपरम् । यः पठेच्छृणुयान्नित्यं तस्य लक्ष्मीः स्थिरा भवेत् ॥२९॥)

मित्रों, एक बाजोट (लकड़ी के चौकी) पर लाल अथवा पीले कपड़े को बिछाकर उसपर स्फटिक का श्रीयन्त्र जो कछुए के ऊपर बना हो स्थापित करें । ये विधि सायंकाल में करनी है और सुबह वो चावल किसी लक्ष्मी अथवा विष्णु के मन्दिर में दान कर देना है ।।

इस क्रिया को तीन गुरु अथवा सूर्यवार को करना है । आपके सात पीढ़ियों की दरिद्रता दूर होकर अचल लक्ष्मी की प्रतिष्ठा आपके घर में हो जाएगी । पूर्ण श्रद्धा-विश्वास-समर्पण के साथ इसके साथ-साथ लक्ष्मी हृदय स्तोत्र का भी पाठ करें ।।

अथ श्री नारायण हृदय स्तोत्रम् ।। (नारायणहृदयम्) ।।

                                                 ॥ श्रियै नमः ॥
            ॥ श्रीमते नारायणाय नमः ॥


॥ अथर्वरहस्ये उत्तर खण्डे अथ श्री नारायण हृदयम् ॥

(अथ भूमिका) यथा- भोजन, नींद, भय, मैथुन इत्यादि तो सामान्य जानवरों में भी होती है । परन्तु कुछ विशिष्ट करने की क्षमता मनुष्य में होती है, जिसे अवश्य ही करना चाहिए ।।

आहार-निद्रा-भय-मुख्यकानि सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् ।
बुद्धिर्हि तेषामधिको विशेषो बुद्ध्या विहीनः पशुभिः समानः ।

परन्तु जो भी हमे करें इतना हमें अवश्य ध्यान रखना चाहिए, की जो शास्त्र विधि के अनुसार हो उसे ही करें । शास्त्र विधि का परित्याग करके जो अपनी मनमानी करता है, उसे किसी भी कार्य में सिद्धि नहीं मिलती है ।। यथा- यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्धिमाप्नोति न सुखं परां गतिम् ॥ २३॥

तस्मा-च्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्य-व्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ २४॥

धर्मस्य ह्यापवर्गस्य नार्थोऽर्थायोपकल्पते ।
     नार्थस्य धर्मैकान्तस्य कामो लाभाय हि स्मृतः ॥

कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभो जीवेत यावता ।
     जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभिः ॥

नास्था धर्मे न वसुनिचये नैव कामोपभोगे
     यद्यद्भव्यं भवतु भगवन् पूर्वकर्मानुरूपम् ।
एतत्प्रार्थ्यं मम बहुमतं जन्मजन्मान्तरेऽपि
     त्वत्पादाम्भोरुहयुगगता निश्च्ला भक्तिरस्तु ॥

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नादिकं ततः ।
यस्मिन्स्तिथो न दुःखेन गुरुणाऽपि विचाल्यते ॥

श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेत-स्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः ।
श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसे वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमात् वृणीते ॥

दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभङ्गुरः ।
तथाऽपि दुर्लभं मन्ये वैकुण्ठप्रियदर्शनम् ॥

मच्चित्ता मद्गत-प्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥

एष मे सर्वधर्माणं धर्मोऽधिकतमो मतः ।
यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥

लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते
     मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः ।
तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्यु याव-
     न्निश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात् ॥

विश्वं नारायणं देवमक्षरं परमं पदम् ।
     विश्वतः परमान्नित्यं विश्वं नारायणँ हरिम् ।
विश्वमेवेदं पुरुषस्तद्विश्वमुपजीवति ।
     पतिं विश्वस्यात्मेश्वरँ शाश्वतँ शिवमच्युतम् ।
नारायणं महाज्ञेयं विश्वात्मानं परायणम् ॥

नारायणपरो ज्योतिरात्मा नारायणः परः ।
नारायणपरं ब्रह्म तत्त्वं नारायणः परः ।
नारायणपरो ध्याता ध्यानं नारायणः परः ।
यच्च किञ्चिज्जगत्सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा ।
अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः ।


अथ श्री नारायण हृदयम् आरम्भः ।।

हरिः ओम् ॥ अस्य श्रीनारायण-हृदय-स्तोत्र-महामन्त्रस्य भार्गव ऋषिः,
अनुष्टुप्छन्दः, लक्ष्मीनारायणो देवता, नारायण-प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥

                     ॥ करन्यासः ॥

         नारायणः परं ज्योतिरिति अङ्गुष्ठाभ्यां नमः,
         नारायणः परं ब्रह्मेति तर्जनीभ्यां नमः,
         नारायणः परो देव इति मध्यमाभ्यां नमः,
         नारायणः परं धामेति अनामिकाभ्यां नमः,
         नारायणः परो धर्म इति कनिष्ठिकाभ्यां नमः,
         विश्वं नारायण इति करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥

                   ॥ अङ्गन्यासः ॥

         नारायणः परं ज्योतिरिति हृदयाय नमः,
         नारायणः परं ब्रह्मेति शिरसे स्वाहा,
         नारायणः परो देव इति शिखायै वौषट्,
         नारायणः परं धामेति कवचाय हुम्,
         नारायणः परो धर्म इति नेत्राभ्यां वौषट्,
         विश्वं नारायण इति अस्त्राय फट्,
         भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्धः ॥

            ॥ अथ ध्यानम् ॥

उद्यादादित्यसङ्काशं पीतवासं चतुर्भुजम् ।
शङ्खचक्रगदापाणिं ध्यायेल्लक्ष्मीपतिं हरिम् ॥१॥

त्रैलोक्याधारचक्रं तदुपरि कमठं तत्र चानन्तभोगी
तन्मध्ये भूमि-पद्माङ्कुश-शिखरदळं कर्णिकाभूत-मेरुम् ।
तत्रत्यं शान्तमूर्तिं मणिमय-मकुटं कुण्डलोद्भासिताङ्गं
लक्ष्मी-नारायणाख्यं सरसिज-नयनं सन्ततं चिन्तयामः ॥२॥

अस्य श्रीनारायणाहृदय-स्तोत्र-महामन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, नारायणो देवता, नारायण-प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥

ॐ नारायणः परं ज्योति-रात्मा नारायणः परः ।
नारायणः परं ब्रह्म नारायण नमोऽस्तु ते ॥ ३॥

नारायणः परो देवो धाता नारायणः परः ।
नारायणः परो धाता नारायण नमोऽस्तु ते ॥ ४॥

नारायणः परं धाम ध्यानं नारायणः परः ।
नारायण परो धर्मो नारायण नमोऽस्तु ते ॥ ५॥

नारायणः परो देवो विद्या नारायणः परः ।
विश्वं नारायणः साक्षान् नारायण नमोऽस्तु ते ॥ ६॥

नारायणाद् विधि-र्जातो जातो नारायणाद् भवः ।
जातो नारायणादिन्द्रो नारायण नमोऽस्तु ते ॥ ७॥

रवि-र्नारायण-स्तेजः चन्द्रो नारायणो महः ।
वह्नि-र्नारायणः साक्षात् नारायण नमोऽस्तु ते ॥ ८॥

नारायण उपास्यः स्याद् गुरु-र्नारायणः परः ।
नारायणः परो बोधो नारायण नमोऽस्तु ते ॥ ९॥

नारायणः फलं मुख्यं सिद्धि-र्नारायणः सुखम् ।
हरि-र्नारायणः शुद्धि-र्नारायण नमोऽस्तु ते ॥ १०॥

निगमावेदितानन्त-कल्याणगुण-वारिधे ।
नारायण नमस्तेऽस्तु नरकार्णव-तारक ॥ ११॥

जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि-पारतन्त्र्यादिभिः सदा ।
दोषै-रस्पृष्टरूपाय नारायण नमोऽस्तु ते ॥ १२॥

वेदशास्त्रार्थविज्ञान-साध्य-भक्त्येक-गोचर ।
नारायण नमस्तेऽस्तु मामुद्धर भवार्णवात् ॥ १३॥

नित्यानन्द महोदार परात्पर जगत्पते ।
नारायण नमस्तेऽस्तु मोक्षसाम्राज्य-दायिने ॥ १४॥

आब्रह्मस्थम्ब-पर्यन्त-मखिलात्म-महाश्रय ।
सर्वभूतात्म-भूतात्मन् नारायण नमोऽस्तु ते ॥ १५॥

पालिताशेष-लोकाय पुण्यश्रवण-कीर्तन ।
नारायण नमस्तेऽस्तु प्रलयोदक-शायिने ॥ १६॥

निरस्त-सर्वदोषाय भक्त्यादि-गुणदायिने ।
नारायण नमस्तेऽस्तु त्वां विना न हि मे गतिः ॥ १७॥

धर्मार्थ-काम-मोक्षाख्य-पुरुषार्थ-प्रदायिने ।
नारायण नमस्तेऽस्तु पुनस्तेऽस्तु नमो नमः ॥ १८॥

॥ अथ प्रार्थना ॥


नारायण त्वमेवासि दहराख्ये हृदि स्थितः ।
प्रेरिता प्रेर्यमाणानां त्वया प्रेरित मानसः ॥ १९॥

त्वदाज्ञां शिरसा कृत्वा भजामि जन-पावनम् ।
नानोपासन-मार्गाणां भवकृद् भावबोधकः ॥ २०॥

भावार्थकृद् भवातीतो भव सौख्यप्रदो मम ।
त्वन्मायामोहितं विश्वं त्वयैव परिकल्पितम् ॥ २१॥

त्वदधिष्ठान-मात्रेण सा वै सर्वार्थकारिणी ।
त्वमेव तां पुरस्कृत्य मम कामान् समर्थय ॥ २२॥

न मे त्वदन्यस्त्रातास्ति त्वदन्यन्न हि दैवतम् ।
त्वदन्यं न हि जानामि पालकं पुण्यवर्धनम् ॥ २३॥

यावत्सांसारिको भावो मनस्स्थो भावनात्मकः ।
तावत्सिद्धिर्भवेत् साध्या सर्वदा सर्वदा विभो ॥ २४॥

पापिना-महमेकाग्रो दयालूनां त्वमग्रणीः ।
दयनीयो मदन्योऽस्ति तव कोऽत्र जगत्त्रये ॥ २५॥

त्वयाहं नैव सृष्टश्चेत् न स्यात्तव दयालुता ।
आमयो वा न सृष्टश्चे-दौषधस्य वृथोदयः ॥ २६॥

पापसङ्ग-परिश्रान्तः पापात्मा पापरूप-धृक् ।
त्वदन्यः कोऽत्र पापेभ्यः त्रातास्ति जगतीतले ॥ २७॥

त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव ॥ २८॥

प्रार्थनादशकं चैव मूलष्टकमथःपरम् ।
यः पठेच्छृणुयान्नित्यं तस्य लक्ष्मीः स्थिरा भवेत् ॥ २९॥

नारायणस्य हृदयं सर्वाभीष्ट-फलप्रदम् ।
लक्ष्मीहृदयकं स्तोत्रं यदि चैतद्विनाकृतम् ॥ ३०॥

तत्सर्वं निष्फलं प्रोक्तं लक्ष्मीः क्रुध्यति सर्वदा ।
एतत्सङ्कलितं स्तोत्रं सर्वाभीष्ट-फलप्रदम् ॥ ३१॥

जपेत् सङ्कलितं कृत्वा सर्वाभीष्ट-मवाप्नुयात् ।
नारायणस्य हृदयं आदौ जप्त्वा ततःपरम् ॥ ३२॥

लक्ष्मीहृदयकं स्तोत्रं जपेन्नारायणं पुनः ।
पुनर्नारायणं जप्त्वा पुनर्लक्ष्मीनुतिं जपेत् ॥३३॥

तद्वद्धोमाधिकं कुर्या-देतत्सङ्कलितं शुभम् ।
एवं मध्ये द्विवारेण जपेत् सङ्कलितं शुभम् ॥ ३४॥

लक्ष्मीहृदयके स्तोत्रे सर्वमन्यत् प्रकाशितम् ।
सर्वान् कामानवाप्नोति आधिव्याधि-भयं हरेत् ॥ ३५॥

गोप्यमेतत् सदा कुर्यात् न सर्वत्र प्रकाशयेत् ।
इति गुह्यतमं शास्त्रं प्रोक्तं ब्रह्मादिभिः पुरा ॥ ३६॥

लक्ष्मीहृदयप्रोक्तेन विधिना साधयेत् सुधीः ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन साधयेद् गोपयेत् सुधीः ॥ ३७॥

यत्रैतत्पुस्तकं तिष्ठेत् लक्ष्मीनारायणात्मकम् ।
भूत पैशाच वेताळ भयं नैव तु सर्वदा ॥ ३८॥

भृगुवारे तथा रात्रौ पूजयेत् पुस्तकद्वयम् ।
सर्वदा सर्वदा स्तुत्यं गोपयेत् साधयेत् सुधीः ।
गोपनात् साधनाल्लोके धन्यो भवति तत्त्वतः ॥ ३९॥

॥ इत्यथर्वरहस्ये उत्तरभागे नारायण हृदय स्तोत्रं ॥


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श्री विष्णु अष्टोत्तरशतनामावलिः॥

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ॐ विष्णवे नमः ।
ॐ लक्ष्मीपतये नमः ।
ॐ कृष्णाय नमः ।
ॐ वैकुण्ठाय नमः ।
ॐ गरुडध्वजाय नमः ।
ॐ परब्रह्मणे नमः ।
ॐ जगन्नाथाय नमः ।
ॐ वासुदेवाय नमः ।
ॐ त्रिविक्रमाय नमः ।
ॐ दैत्यान्तकाय नमः ।
ॐ मधुरिपवे नमः ।
ॐ तार्क्ष्यवाहनाय नमः ।
ॐ सनातनाय नमः ।
ॐ नारायणाय नमः ।
ॐ पद्मनाभाय नमः ।
ॐ हृषीकेशाय नमः ।
ॐ सुधाप्रदाय नमः ।
ॐ माधवाय नमः ।
ॐ पुण्डरीकाक्षाय नमः ।

 

ॐ स्थितिकर्त्रे नमः ।
ॐ परात्पराय नमः ।
ॐ वनमालिने नमः ।
ॐ यज्ञरूपाय नमः ।
ॐ चक्रपाणये नमः ।
ॐ गदाधराय नमः ।
ॐ उपेन्द्राय नमः ।
ॐ केशवाय नमः ।
ॐ हंसाय नमः ।
ॐ समुद्रमथनाय नमः ।
ॐ हरये नमः ।
ॐ गोविन्दाय नमः ।
ॐ ब्रह्मजनकाय नमः ।
ॐ कैटभासुरमर्दनाय नमः ।
ॐ श्रीधराय नमः ।
ॐ कामजनकाय नमः ।
ॐ शेषशायिने नमः ।
ॐ चतुर्भुजाय नमः ।
ॐ पाञ्चजन्यधराय नमः ।

 

ॐ श्रीमते नमः ।
ॐ शार्ङ्गपाणये नमः ।
ॐ जनार्दनाय नमः ।
ॐ पीताम्बरधराय नमः ।
ॐ देवाय नमः ।
ॐ सूर्यचन्द्रविलोचनाय नमः ।
ॐ मत्स्यरूपाय नमः ।
ॐ कूर्मतनवे नमः ।
ॐ क्रोडरूपाय नमः ।
ॐ नृकेसरिणे नमः ।
ॐ वामनाय नमः ।
ॐ भार्गवाय नमः ।
ॐ रामाय नमः ।
ॐ बलिने नमः ।
ॐ कल्किने नमः ।
ॐ हयाननाय नमः ।
ॐ विश्वम्भराय नमः ।
ॐ शिशुमाराय नमः ।
ॐ श्रीकराय नमः ।
ॐ कपिलाय नमः ।
ॐ ध्रुवाय नमः ।

 

ॐ दत्तत्रेयाय नमः ।
ॐ अच्युताय नमः ।
ॐ अनन्ताय नमः ।
ॐ मुकुन्दाय नमः ।
ॐ दधिवामनाय नमः ।
ॐ धन्वन्तरये नमः ।
ॐ श्रीनिवासाय नमः ।
ॐ प्रद्युम्नाय नमः ।
ॐ पुरुषोत्तमाय नमः ।
ॐ श्रीवत्सकौस्तुभधराय नमः ।
ॐ मुरारातये नमः ।
ॐ अधोक्षजाय नमः ।
ॐ ऋषभाय नमः ।
ॐ मोहिनीरूपधारिणे नमः ।
ॐ सङ्कर्षणाय नमः ।
ॐ पृथवे नमः ।
ॐ क्षीराब्धिशायिने नमः ।

 

ॐ भूतात्मने नमः ।
ॐ अनिरुद्धाय नमः ।
ॐ भक्तवत्सलाय नमः ।
ॐ नराय नमः ।
ॐ गजेन्द्रवरदाय नमः ।
ॐ त्रिधाम्ने नमः ।
ॐ भूतभावनाय नमः ।
ॐ श्वेतद्वीपसुवास्तव्याय नमः ।
ॐ सनकादिमुनिध्येयाय नमः ।
ॐ भगवते नमः ।
ॐ शङ्करप्रियाय नमः ।
ॐ नीलकान्ताय नमः ।
ॐ धराकान्ताय नमः ।
ॐ वेदात्मने नमः ।
ॐ बादरायणाय नमः ।
ॐ भागीरथीजन्मभूमिपादपद्माय नमः ।

 

ॐ सतां प्रभवे नमः ।
ॐ स्वभुवे नमः ।
ॐ विभवे नमः ।
ॐ घनश्यामाय नमः ।
ॐ जगत्कारणाय नमः ।
ॐ अव्ययाय नमः ।
ॐ बुद्धावताराय नमः ।
ॐ शान्तात्मने नमः ।
ॐ लीलामानुषविग्रहाय नमः ।
ॐ दामोदराय नमः ।
ॐ विराड्रूपाय नमः ।
ॐ भूतभव्यभवत्प्रभवे नमः ।
ॐ आदिदेवाय नमः ।
ॐ देवदेवाय नमः ।
ॐ प्रह्लादपरिपालकाय नमः ।
ॐ श्रीमहाविष्णवे नमः ।

॥ इति श्री महाविष्ण्वष्टोत्तरशतनामवलिः समाप्ता: ॥

श्री आदित्यहृदय स्तोत्रम् ।।

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श्री आदित्यहृदय स्तोत्रम् ।। Shri Aditya Hridaya Stotram.

अथ श्री आदित्यहृदय स्तोत्रम् :-

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् ।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ॥१॥
दैततैश्‍च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् ।
उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥२॥
राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम् ।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसे ॥३॥
आदित्यहृदयं पुण्यं. सर्वशत्रुविनाशनम् ।
जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम् ॥४॥
सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम् ।
चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ॥५॥
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् ।
पुजयस्व विवस्वत्‍नं भास्करं भुवनेश्‍वरम् ॥६॥
सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन: ।
एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभि: ॥७॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्‍च शिव: स्कन्द: प्रजापति: ।
महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यपां पतिः ॥८॥
पितरो वसव: साध्या अश्‍विनौ मरुतो मनु: ।
वायुर्वहिन: प्रजा प्राणा ऋतुकर्ता प्रभाकर: ॥९॥
आदित्य: सविता सुर्य: खग: पूषा गभस्तिमान् ।
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर: ॥१०॥
हरिदश्‍व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान् ।
तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान् ॥११॥
हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि: ।
अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशन: ॥१२॥
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग: ।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥१३॥
आतपी मण्डली मृत्यु: पिगंल: सर्वतापन:।
कविर्विश्‍वो महातेजा: रक्त: सर्वभवोद् भव: ॥१४॥
नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्‍वभावन: ।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते ॥१५॥
नम: पुर्वाय गिरये पश्‍चिमायाद्रये नम: ।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नम: ॥१६॥
जयाय जयभद्राय हर्यश्‍वाय नमो नम: ।
नमो नम: सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नम: ॥१७॥
नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नम: ।
नम: पह्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ॥१८॥
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे ।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम: ॥१९॥
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने ।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम: ॥२०॥
तप्तचामीकराभाय हरये विश्‍वकर्मणे ।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥२१॥
नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभु: ।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि: ॥२२॥
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित: ।
एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ॥२३॥
देवाश्‍च क्रतवश्‍चैव क्रतुनां फलमेव च ।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वषु परमप्रभु: ॥२४॥
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च ।
कीर्तयन् पुरुष: कश्‍चिन्नावसीदति राघव ॥२५॥
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगप्ततिम् ।
एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥२६॥
अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि ।
एवमुक्ता ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम् ॥२७॥
एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत् तदा ॥
धारयामास सुप्रीतो राघव: प्रयतात्मवान् ॥२८॥
आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान् ।
त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥२९॥
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम् ।
सर्वयत्‍नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत् ॥३०॥
अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण: ।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥३१॥

।।  इति श्री आदित्यहृदय स्तोत्रम् सम्पूर्णं ।।

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सूर्य की दशा में अन्य ग्रहों का फल।।

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Surya Mahadasha in all planets
Surya Mahadasha in all planets

सूर्य की महादशा में मंगल विजय और बुध कुष्ठ रोग देता है । सूर्य की महादशा में अन्य सभी ग्रहों की अन्तर्दशा का शुभाशुभ फल।। Surya Mahadasha in all planets.

मित्रों, आज हम बात करेंगे ग्रह दशा के विषय में । किसी भी ग्रह की महादशा के अंतर्गत सभी ग्रहों की अन्तर्दशा आती है । फिर उनके अन्दर भी सभी ग्रहों की प्रत्यंतर दशा आती है उस समय में इन ग्रहों की दशा-अन्तर्दशायें जातक को किस प्रकार का फल देती है इस विषय में हम आज बात करेंगे ।।

तो सबसे पहले हम सूर्य की महादशा में बाकी सभी ग्रहों की अंतर्दशा किस प्रकार का फल देती है, इस विषय में विस्तृत चर्चा करेंगे । तो आइए सबसे पहले सूर्य की महादशा में चन्द्रमा की अंतर्दशा किस प्रकार का फल देती है, इस विषय में जानते हैं ।।

मित्रों, सूर्य की महादशा अच्छी होती है, अधिकांश अच्छी होती है, क्योंकि सूर्य धन, प्रतिष्ठा, यश, समृद्धि, ऐश्वर्य और पिता का कारक ग्रह होता है । और कोई भी पिता अपने संतान को दुखी नहीं देख सकता ।।

इसलिए सूर्य कुंडली में अगर अच्छा हो तो बहुत ही शुभ फल देता है । बहुत कम परिस्थितियों में सूर्य अशुभ फल दायक होता है, अन्यथा अधिकांशत: परिस्थितियों में सूर्य जातक को अपनी दशा-अंतर्दशा में शुभ फल ही देता है ।।

मित्रों, यदि आपकी कुंडली में सूर्य की महादशा चल रही हो और सूर्य की महादशा में चंद्रमा की अंतर्दशा हो तो आपके शत्रुओं का नाश, आरोग्य, धन लाभ तथा समस्त सुखों की प्राप्ति होती है ।।

मित्रों, सूर्य की महादशा में मंगल की अंतर्दशा यदि चल रही हो और आप का मंगल शुभ हो तो रत्न, सुवर्ण, मणि आदि की प्राप्ति, कहीं भी जाओ विजय ही विजय की प्राप्ति होती है । एक दिव्य प्रकार की तेजस्विता एवं हर प्रकार के सुखों का लाभ जातक को होता है ।।

मित्रों, सूर्य की महादशा में अगर बुध की अंतर्दशा आपके ऊपर चल रही हो और यह बुध अगर अच्छा ना हो तो दाद, खाज, खुजली, दिनाय एवं कुष्ठ रोग होता है । इस समय में जातक के शत्रुओं की वृद्धि होती है तथा कष्ट आता है ।।

मित्रों, सूर्य की महादशा में गुरु की अंतर्दशा हो तो जातक के रोगों, शत्रुओं, पाप एवं दीनता आदि का नाश करके यह गुरु धर्म और अनेक प्रकार के सुखों की प्राप्ति करवाता है ।।

मित्रों, सूर्य की महादशा में यदि आपके ऊपर शुक्र की अंतर्दशा हो तो मस्तक और कंठ में रोग, ज्वर, शूल और शत्रु से पराजय होती है ।।

मित्रों, सूर्य की महादशा में यदि शनि की अंतर्दशा हो तो जातक को सरकार की तरफ से भय, दीनता, शत्रुओं से पराजय तथा अनेक प्रकार के कष्टों की प्राप्ति होती है ।।

मित्रों, सूर्य की महादशा के अंतर्गत राहु और केतु की अंतर्दशा आए तो उन ग्रहों के प्लेसमेंट के आधार पर यह निर्धारित किया जाता है, कि वह शुभ फल देंगे अथवा अशुभ फल देंगे । वैसे सूर्य की महादशा में राहु और केतु की अंतर्दशा शुभ नहीं होती है ।।

इस लेख को YouTube पर विडियो में व्याख्यान के रूप में इस लिंक पर जाकर आप सुन एवं समझ भी सकते हैं – Surya Mahadasha me Baki Grahon Ka fal.

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पूजन विधि ।। भाग – 3.

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Poojan Vidhi Part-3
Poojan Vidhi Part-3

पूजन विधि ।। भाग – 3. Poojan Vidhi Part-3.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, आप सभी को पूजन विधान के अंतर्गत मैंने पहले पूजन की तैयारी, पूजा सामग्री सजाने की विधि बताया । आगे भी मैंने अपने दुसरे अंक में आचमन, प्राणायाम, पवित्रीकरण, तिलक धारण करने की विधि से लेकर रक्षा विधान तक बताया ।।

अब यहाँ से आगे स्वस्तिपाठ से लेकर संकल्प तक की प्रक्रिया सरल करके सहज भाषा में बताने का प्रयास कर रहा हूँ ।।

अपनी जानकारी हेतु पूजन शुरू करने के पूर्व प्रस्तुत पद्धति एक बार जरूर पढ़ लें।

प्रथम पूजन की व्यवस्था, तब दीप प्रज्वालन, आचमन, पवित्रकरण, आसन शुद्धि, पवित्री धारणं, तिलक करणं, ग्रंथि बन्धनं, रक्षा विधान ।।

ब्राह्मण के हाथ से यजमान अपने हाथ में रक्षा सूत्र इस मन्त्र से बंधवाए:-

ॐ यदाबध्नन दाक्षायणा हिरण्य(गुं)शतानीकाय सुमनस्यमानाः ।
तन्म आ बन्धामि शत शारदायायुष्मांजरदष्टियर्थासम्‌ ।।

दीपक:- दीपक प्रज्वलित करें एवं हाथ धोकर दीपक का पुष्प एवं कुंकु से पूजन करें-

भो दीप देवरुपस्त्वं कर्मसाक्षी ह्यविघ्नकृत ।
यावत्कर्मसमाप्तिः स्यात तावत्वं सुस्थिर भव ।।

(दीप का पूजन कर प्रणाम करें)

स्वस्ति-वाचन:- निम्न मंगल मन्त्रों का सहज भाव से उच्चारण करें:- हस्ते अक्षत पुष्पाणि गृहीत्वा शांतिपाठं पठेयु: तदुपरि लक्ष्मीनारायणादिदेवान्प्रणमेत् ।।

।। अथ शान्तिपाठः ।।

ॐ आनोभद्राः क्रतवोयन्तु व्विश्वतोदब्धासोऽअपरीतासऽउद्धिदः ।।
देवानोयथासदमिद्वृधेऽअसन्नप्प्रायुवोरक्षितारोदिवेदिवे ।। १ ।।
देवानांभद्रासुमतिऋजूयतान्देवाना (गुं) रातिरभिनोनिवर्तताम् ।।
देवाना (गुं) सख्यमुप सेदिमाव्वयन्देवानऽआयुः प्प्रतिरंतुजीवसे ।। २ ।।
तान्पूर्व्वयानिविदाहूमहेव्वयम्भगम्मित्रमदितिन्दक्षमस्त्रिधम् ।।
अर्य्यमणम् ब्वरुण (गुं) सोममश्विनासरस्वतीनः सुभगामयस्करत् ।। ३ ।।
तन्नोव्वातोमयोभुव्वातुभेषजन्तन्मातापृथिवीतत्पिताद्यौः ।।
तद्‌ग्रावाणः सोमसुतो मयो भुवस्तदश्विनाश्रृणुतन्धिष्ण्यायुवम् ।। ४ ।।
तमीशानञ्जगतस्तस्थुषस्पतिन्धियञ्जिन्न्वमवसेहूमहेव्वयम् ।।
पूषानोयथाव्वेदसामसदवृधेरक्षितापायुरदब्धः स्वस्तये ।। ५ ।।

स्वस्तिनऽइन्द्रोवृद्धश्रवाः स्वस्तिनः पूषाव्विश्ववेदाः ।।
स्वस्तिनस्तार्क्ष्योऽअरिष्टनेमिः स्वस्तिनोबृहस्पतिर्द्दधातु ।। ६ ।।
पृषदश्वामरुतः पृश्रिमातरः शुभंयावानोव्विदथेषुजग्मयः ।।
अग्निर्जिव्हामनवः सूरचक्षसोव्विश्वेनोदेवाऽअवसागमन्निह ।। ७ ।।
भद्रङ्‌कर्णेभिः श्रृणुयामदेवाभद्रंपश्येमाक्ष भिर्यजत्राः ।।
स्थिरैरङैस्तुष्टुवा (गुं) सस्तनूभिर्व्व्यशेमहिदेवहितंयदायुः ।। ८ ।।
शतमिन्नुशरदोऽअन्तिदेवायत्रानश्चक्राजरसन्तनूनाम् ।।
पुत्रासोयत्र पितरोभवन्तिमानोमध्यारीरिषतार्युगन्तोः ।। ९ ।।
अदितिर्द्योरदितिरन्तरिक्षमदितिर्मातासपितासपुत्रः ।।
विश्वेदेवाऽअदितिः पञ्चजनाऽअदितिर्जातमदिति र्ज्जनित्त्वम् ।। १० ।।
तम्पत्प्नीभिरनुगच्छेमदेवाः पुत्रैर्भ्रातृभिरुतवाहिरण्यैः ।।
नाकृङश्णानाः सुकृतस्य लोकेतृतीयेपृष्ठेऽअधिरोचनेदिवः ।। ११ ।।
आयुष्यँव्वर्च्चस्व (गुं) रायस्पोषमौद्धिदम् ।।
इद (गुं) हिरण्यं वर्च्चस्वज्जैत्रायाविशतादुमाम् ।। १२ ।।

द्यौः शांतिरन्तरिक्ष (गुं) (र्ठः) शांतिः पृथिवीशांतिरापः शांति रोषधयः शांतिः ।।
व्वनस्पतयः शांतिर्विश्वेदेवाः शांतिर्ब्रह्मशांतिः सर्व्व (गुं, र्ठः) शांतिः शांतिरेवशांतिः सामाशांतिरोधि ।। १३ ।।

यतोयतः समीहसेततोनोऽअभयङ्‌कुरु ।।
शन्नः कुरु प्रजाभ्योभयन्नः पशुभ्यः ।। १४ ।।

।। सुशांतिर्भवतु ।।

देवता नमस्कार:-
ॐ श्रीमहागणाधिपतये नमः ।। ॐ श्री लक्षीनारायणाभ्यां नमः ।। ॐ श्री उमामहेश्वराभ्यां नमः ।। ॐ श्री वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नमः ।। ॐ श्री शचीपुरंदराभ्यां नमः ।। ॐ श्री मातृपितृचरणकमलेभ्यो नमः ।। ॐ श्री कुलदेवताभ्यो नमः ।। ॐ श्री इष्टदेवताभ्यो नमः ।। ॐ श्री ग्रामदेवताभ्यो नमः ।। ॐ श्री स्थानदेवताभ्यो नमः ।। ॐ श्री वास्तुदेवताभ्यो नमः ।। ॐ श्री सर्वेभ्यो देवभ्यो नमः ।। ॐ श्री सर्वाभ्यो देविभ्यो नम: ।। ॐ श्री सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नम: । ॐ श्री सिद्धिबुद्धिसहितेन श्री मन्महागणाधिपतये नम: ।।

ॐ सुमुखश्चैकदंतश्च कपिलोगजकर्णकः ।।
लंबोदरश्च विकटो विघ्रनाशो विनायकः ।। १ ।।
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचंद्रो गजाननः ।।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ।। २ ।।
विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।।
संग्रामेसंकटे चैव विघ्रस्तस्य न जायते ।। ३ ।।
शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजं ।।
प्रशन्न वदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ।। ४ ।।
अभीप्सितार्थसिद्धयर्थम् पूजितो यः सुरासुरैः ।।
सर्वविघ्रहरस्तस्मै श्री गणाधिपतये नमः ।। ५ ।।
सर्वमङगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।।
शरण्ये त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोस्तुते ।। ६ ।।
सर्वदा सर्व कार्येषु नास्ति तेषाम् मंगलं ।।
येषां हृदयस्थो भगवान मंगलायतनम् हरिः ।। ७ ।।
तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चन्द्रबलं तदेव ।।
विद्याबलं दैवबलं तदेव लक्ष्मीस्पतेतेंघ्री युगं स्मरामि ।। ८ ।।
लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः ।।
येषांमिन्दीवरस्यमो ह्रिदयस्थो जनार्दनः ।। ९ ।।
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवानीतिर्मतिर्मम् ।। १० ।।
अनन्याश्चिन्तयन्तो माम् ये जनाः पर्युपासते ।।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ।। ११ ।।
स्मृते: सकलकल्याणं भाजनं यत्र जायते ।।
पुरुषं तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम् ।। १२ ।।
सर्वेष्वारम्भ कार्येषु त्रयस्त्रिभुवनिश्वरा: ।।
देवा दिशन्तु न: सिद्धिं ब्रह्मेशानजनार्दना: ।। १३ ।।
विश्वेशं माधवं ढूण्ढीम् दण्डपाणिम् च भैरवं ।।
वन्दे काशीं गुहां गंगां भवानीम् मणिकर्णिकां ।। १४ ।।
विनायकं गुरुं भानुं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरान् ।।
सरस्वती प्रणम्यादौ सर्वकार्यार्थसिद्धये ।। १५ ।।
वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ ।।
निर्विघ्रं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ।। १६ ।।

।। इति प्रणम्य ।।

हस्ते जलाक्षत पूगीफल द्रव्यं च गृहीत्वा संकल्पं कुर्यात् ।।

संकल्प:- अपने दाहिने हाथ में जल, पुष्प, अक्षत व द्रव्य लेकर श्रीसत्यनारायण भगवान आदि के पूजन का संकल्प करें-

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्री ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयेपरार्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कृत त्रेता द्वापरान्ते कलि-युगे कलि प्रथम चरणे जम्बूद्विपे भूर्लोके भरतखंडे भारतवर्षे आर्य्यावर्तेकदेशांतर्गते (अमुक) क्षेत्रे/नगरे/ग्रामे (अमुक) संवत्सरे, (अमुक) ऋतौ, मासानाममासोत्तमे मासे (अमुक) मासे (अमुक) तिथौ (अमुक) वासरे (अमुक) नक्षत्रे (अमुक) राशिस्थिते श्री चन्द्रे (अमुक) राशिस्थिते श्री सूर्ये शेषेषु ग्रहेषु यथा यथं राशि स्थान स्थितेषु सत्सु एवं ग्रहगुण विशेषण विशिष्टायां शुभ पुण्यतिथौ अमुकगोत्रोत्पन्नोऽहं अमुक (अगर ब्राह्मण हो और चाहे कोई भी टाइटल हो, तो भी – शर्माऽहं बोले) (अगर क्षत्रिय हो और चाहे कोई भी टाइटल हो, तो भी – वर्माऽहं बोले) (अगर बनिये की श्रेणी में हो और चाहे कोई भी टाइटल हो, तो भी – गुप्तोऽहं बोले) और (उसके नीचे चाहे कोई भी टाइटल हो, तो भी – भक्तोऽहं बोले) ममगृहे सकुटुंबस्य सपरिवारस्यसर्वारिष्टप्रशांत्यायुरारोग्यैश्वर्यसुख श्रीप्राप्त्यर्थं पुत्रपौत्रधनधान्यादिसंपत्प्रवृध्दये अभिलषितमनोरथसिध्यर्थं वास्तुकृतदोषोपशांतये समस्त देव्यादिदेवताप्रीतये सनवग्रहसहितेन अमुक देव पूजनं ऽहं करिष्ये ।।

तदंगत्वेनगणपतिपूजनं पुण्याहवाचनं मातृकावसोर्धारापूजनं वृध्दि श्राध्द आचार्य ऋत्विग्वरणादिकर्मऽहंकरिष्ये ।।

।। इति संकल्प्य ।।

गणपतिपूजनं स्वस्तिपुण्याहवाचनं मातृकावसोर्धारापूजनम आयुष्यमंत्रजपं नांदीश्राध्दंचपूर्ववत् ‍कृत्वा आचार्यमष्टौचतुरोवाऋत्विजश्चवृत्वावस्त्रालंकारादिभिः संपूजयेत ।।

(अमुक) गोत्रोत्पन्न (अमुक) नाम ( शर्मा/ वर्मा/ गुप्तो भक्तोऽहम्‌ अहं) ममअस्मिन कायिक वाचिक मानसिक ज्ञातज्ञात सकल दोष परिहारार्थं श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त फल प्राप्त्यर्थं आरोग्यैश्वर्य दीर्घायुः विपुल धन धान्य समृद्धर्थं पुत्र-पौत्रादि अभिवृद्धियर्थं व्यापारे उत्तरोत्तरलाभार्थं सुपुत्र पौत्रादि बान्धवस्य सहित श्रीसत्यनारायण देव पूजनं अहम् करिष्ये । तत्र सर्वे आदौ मम जीवने तथा च कार्य क्षेत्रेण आगतायां विघ्नायां सर्व विघ्न प्रशमनार्थाय गणेश-अम्बिका पूजनम्‌ च अहम् करिष्ये/ करिष्यामि अथवा कारयिष्ये ।।

।। इति संकल्प्य ।।

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देवार्चन के लिए संग्रहणीय द्रव्य, भाग – २.।।

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Devarchana Hetu Sangrahaniya Dravya Part-2

देवार्चन के लिए संग्रहणीय द्रव्य, भाग – २.।। Devarchana Hetu Sangrahaniya Dravya. Part – 2.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, आज हम बात करेंगे किसी भी तरह की पूजा पाठ अर्चना वंदना या अनुष्ठान में लगने वाले सामग्रियों के विषय में । किस प्रकार की और कौन-कौन सी सामग्री आवश्यक होती है ।।

किसी भी तरह की पूजा पाठ के लिए । आज हम छोटे से छोटे और बड़े से बड़े अनुष्ठान में आवश्यक सामग्रियों के विषय में चर्चा करेंगे और जानेंगे कि वह क्या होता है और क्यों लगता है ।।

१.पञ्चगव्य:- गोबर, गोमूत्र, गोघृत, गोदुग्ध एवं गोदधि यथाविधि ।।
२.पञ्चामृत:- गोदुग्ध, गोघृत, गोदधि, मधु एवं शर्करा (गुड़) ।।
३.पञ्चमेवा:- दाख, छुहारा, बादाम, नारियल एवं अखरोट आदि ।।
४.नवग्रह समिधा:- अर्क, पलास, खैर, अपामार्ग, गूलर, पीपल, शमी, कुशा एवं दूर्वा ।।

५.पूजोपकरण:- गन्ध (चन्दन), पुष्प, पुष्पमाला, तुलसी, विल्वपत्र, परिमल द्रव्य:- सिन्दूर, अबीर, इत्र एवं अष्टगन्ध आदि ।।

ऋतुफल:- ऋतु के अनुसार फलों का संग्रह करना चाहिए । कुछ फल सभी ऋतुओं में प्राप्त होते हैं, किन्तु कुछ फल ऋतु विशेष में मिलते हैं उन सभी का संग्रह देवपूजन हेतु आवश्यक होता है ।।

नागरवेल का पान, सुपारी, इलाचयी, लवंग, मिष्टान्न, वस्त्र, उपवस्त्र, रक्षा सूत्र, धोती, साड़ी, गमछा एवं अन्य सौभाग्य द्रव्य आभूषण आदि यथाशक्ति ।।

उपर्युक्त वस्तुओं का यथाशक्ति संग्रह करना चाहिए । किन्तु हम देवार्चन कर रहे हैं अतः सुन्दर; उत्तमोत्तम संक्षिप्त किन्तु उपयोगी हो, ऐसी वस्तुओं का ही संग्रह करना चाहिए । इस बात का सतत् ध्यान रखना जरुरी है ।।

कर्मोपयोगी सप्तधान्यादि विवरण:- पूजोपकरण में सप्तधान्य, सप्तमृत्तिका आदि का प्रयोग किया जाता है । निम्नांकित कारिकाओं में उनका संग्रह है: –

१.सप्तधान्य:- यवगोधूमधान्यानि तिलाः कंगुस्तथैव च ।
श्यामकं चणकं चैव सप्तधान्यमुदाहृतम् ।।

अर्थ:- जौ, धान, तिल, कंगनी, मूंग, चना और सावां ये सप्तधान्य कहलाते हैं ।।

२.सर्वोषधि:- मुरा मांसी बचा कुष्ठं शैलेयं रजनीद्वयम् ।
सठी चम्पकमुस्तं च सर्वौषधिगणः सृतः ।। (सर्वाभावे शतावरी)

अर्थ:- मुरा, जटामांसी, बच, कुण्ठ, शिलाजीत, हल्दी, दारुहल्दी, सठी, चम्पक, मुस्ता ये सर्वोषधि कहलाती हैं । अगर यह वस्तुयें उपलब्ध न हो पायें अथवा न मिले तो शतावरी अवश्य रखें ।।

कुष्ठं मांसी या हरिद्रेद्वे मुरा शैलेयचन्दनम् ।
बचा कर्पूरमुस्ता च सर्वौषधयः प्रकीर्तिता ।।

अर्थ:- कूठ, जटामांसी, मुरा, चन्दन, बच, कपूर, मुस्ता, दारु हल्दी और हल्दी । यह भी सर्वोषधि के स्थान पर प्रयुक्त किया जा सकता है ।।

३.सप्तमृद:- गजाश्वरथ्यावल्मीके संगमाद् गोकुलाद् दात् ।
राजद्वारप्रदेशाच्च मृदमानीय निक्षिपेत् ।।

अर्थ:- घुड़साल, हाथीसाल, बाँबी, नदियों के संगम, तालाब, राज द्वार और गोशाला- इन सात स्थानों की मिट्टी को सप्तमृत्तिका कहते हैं ।।

४.पञ्चपल्लव:- अश्वत्थोदुम्बरप्लक्षा: न्यग्रोधश्चूत एव च ।
पञ्चकं पल्लवानां स्यात् सर्वकर्मसु शोभनम् ।।

अर्थ:- पीपल, गूलर, पाकड़, बरगद और आम की पत्तियों को पञ्चपल्लव कहा जाता है ।।

५.पञ्चरत्न:- सुवर्णं रजतं मुक्ता लाजवर्तः प्रबालकम् ।
अभावे सर्वरत्नानां हेम सर्वत्रा योजयेत् ।।

अर्थ:- सोना, चांदी, मोती, लाजावर्त और मूंगा ये पञ्चरत्न कहे जाते हैं । इतना न हो तो स्वर्ण अथवा द्रब्य से भी सब संभव है ।।

६.मधु त्रय:- आज्यं क्षीरं मधु तथा मधुरत्रयमुच्यते ।।

अर्थ:- घी, दूध तथा मधु ये तीनों मधुत्रय कहते जाते हैं ।।

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इस दोष से बने काम बिगड़ जाते हैं।।

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banate kam bigad Jate hain
banate kam bigad Jate hain

बिगडऩे लगते हैं बनते काम अगर आपके घर में हो ऐसा दोष ।। banate kam bigad Jate hain.

मित्रों, वास्तु के अनुसार घर में गलत दिशा में बने बाथरुम से घर में नकारात्मक ऊर्जा का स्तर बढ़ जाता है । जिसके कारण घर के किसी भी सदस्य की तरक्की नहीं हो पाती है । साथ ही बनते काम बिगडऩे लगती है और धन की हानि होती है ।।

वहीं ईशान कोण (उत्तर-पूर्व कोना) पर बाथरूम बना दिया जाए, तो बच्चों की पढ़ाई पर प्रभाव पड़ता है । साथ ही, घर में रहने वाले जातक को मानसिक अशांति रहती है ।।

इसलिए हमारे वास्तुशास्त्र में ईशान कोण पर बाथरूम बनाना पूरी तरह से वर्जित माना गया है । वैसे, घर के बाथरूम के लिए उत्तम दिशाएं दक्षिण, पश्चिम और पूर्व मानी गई हैं । बाथरूम के दरवाजे के ठीक सामने दर्पण कभी न लगाएं । नहाने जाते वक्त हमारे साथ-साथ कुछ नकारात्मक ऊर्जाएं भी बाथरूम में प्रवेश कर जाती हैं ।।

ऐसे में दरवाजे के ठीक सामने दर्पण लगा हुआ हो, तो यह ऊर्जा परावर्तित होकर पुन: घर में लौट आती है । यदि आपके घर में भी ऐसा वास्तुदोष है तो नीचे लिखे उपाय को अपनाएं ये उपाय वास्तुदोष को मिटाने के साथ ही सेहत के मद्देनजर भी महत्वपूर्ण है ।।

वास्तुशास्त्र के मुताबिक बाथरूम में नीले रंग की बाल्टी रखना शुभ होता है । वैसे किसी और रंग की बाल्टियां पहले से घर में मौजूद हैं, तो भी कोई बात नहीं, आप इन्हें भी उपयोग में ला सकती हैं । बाथरूम में रखी बाल्टी हमेशा पानी से भरी रहे, इस बात का खास ख्याल रखें, यह उपाय आपके जीवन में खुशियों के स्थायित्व को बनाए रखने में मददगार होगा ।।

बाथरूम को सजाने के लिए आप प्राकृतिक या पानी के दृश्यों को दर्शाती सीनरी लगा सकती हैं। कहते हैं इससे पानी की कमी जैसी समस्याएं परेशान नहीं करतीं।

बाथरूम में इस्तेमाल की जाने वाली चीज़ें साबुन, शैम्पू, स्क्रब आदि हमेशा खुशबूदार और तौलिया, साबुन केस, ब्रश होल्डर आदि खुशनुमा रंग के चुनें ।।

वास्तुशास्त्र के मुताबिक, उत्तर या पश्चिम की दिशा में कमोड लगाना सेहत के लिहाज़ से ठीक माना जाता है । कमोड का ढक्कन हमेशा नीचे की ओर यानी बंद करके रखें । यह कीटाणुओं और नकारात्मक ऊर्जा को फैलने से रोकने में आपकी मदद करेगा ।।

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