बिजनेस पार्टनर एवं विवाह योग्य साथी के साथ कुण्डली मिलान, इनमें आपसी कलह का कारण एवं उसका निवारण ।।

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बिजनेस पार्टनर एवं विवाह योग्य साथी के साथ कुण्डली मिलान, इनमें आपसी कलह का कारण एवं उसका निवारण ।। Partners Se Kundali Milan

मित्रों, ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जन्मकुण्डली का सप्तम भाव जीवन साथी का भाव माना जाता है । साथ ही सप्तम भाव व्यापार में साझेदार, मित्र तथा हितैषियों के लिए भी विचार करने वाला भाव होता है । अधिकांशतः ज्योतिषीय परिपेक्ष्य में सप्तमेश लग्नेश का सदैव शत्रु ही होता है । जैसे मेष, लग्न के लिए लग्नेश हुआ मंगल एवं सप्तमेश हुआ शुक्र और दोनों में आपस में शत्रुता होती है ।।

प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वभाव से बंधा हुआ अर्थात स्वभाव के कारण लाचार होता है । अपने स्वभाव के विपरीत चलने में हर व्यक्ति को कष्ट होता है । ऐसे में हर एक व्यक्ति एक दूसरे को भी अपने स्वभाव के अनुसार चलाने की कोशिश करता है । लेकिन दो व्यक्तियों के स्वभाव आपस में कितने भिन्न हो सकते हैं यह उनकी कुण्डली से उनके लग्नों एवं राशियों के माध्यम से ज्ञात किया जा सकता है ।।

मित्रों, हाँ यदि लग्न एक दूसरे के 3-11 हो तो आपसी सामजस्य उत्तम रहता है । एक लग्न दूसरे को मित्र मानता है तो दूसरा पहले को अपना पराक्रम अर्थात कष्ट का साथी । जैसे मेष लग्न के लिए मिथुन लग्न उसका पराक्रम का साथी होता है तथा कुम्भ लग्न उसका मित्र होता है । अब इन लग्नों में 4-10 का संबंध भी उत्तम रहता है । इस सम्बन्ध को अगर व्यापार अथवा साझेदारी के लिए देखा जाय तो यह सम्बन्ध सर्वोत्तम होता है ।।

जिस कुण्डली में उसका लग्नेश दशम भाव में हो तो वह जातक कर्मठ होता है । जिसका चतुर्थ भाव में हो तो वही लग्नेश जातक को आर्थिक एवं मानसिक सहायता प्रदान करता है । जैसे उदाहरण के लिये मेष एवं कर्क लग्न की कुण्डली वाले जातक साझेदारी करें तो मेष लग्न की कुण्डली में कर्क राशि चौथे भाव में बैठती है । ऐसे में मेष लग्न के जातक के लिए कर्क लग्न का जातक आर्थिक एवं मानसिक सहायता प्रदान करेगा ।।

मित्रों, इस जातक का पार्टनर अर्थात कर्क लग्न की कुण्डली वाला जातक अगर मेष लग्न की कुण्डली वाले जातक से साझेदारी करे तो उसके लिये मेष लग्न वाला जातक अपनी कर्मठता द्वारा उसका एवं अपना सारा कार्यभार संभाल लेगा । ठीक इसी प्रकार नवम-पंचम का सम्बन्ध भी उन जातकों को शुभ फल प्रदान करता है । इसमें जिस जातक का लग्न उसके पार्टनर के नवम का सूचक होता है, वह अपने पार्टनर के लिए भाग्योदय कारक एवं हर प्रकार का सुख देनेवाला होता है ।।

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इसका दूसरा पक्ष अर्थात पञ्चम कारक जातक अपने साथी के लिए पिता जैसा व्यवहार तो रखता है, लेकिन अपने पार्टनर से सदैव लेने की ही भावना रखता है । इस प्रकार मेष लग्न के लिए सिंह लग्न वाले शुभ होते हुए भी लाभ की स्थिति में रहता है । जबकि मेष लग्न सिंह से नवम होने के कारण उसके लिए सदैव लाभदायक ही होते हैं ।।

मित्रों, द्वितीय-द्वादश सम्बन्ध अशुभ माना गया है, लेकिन इसमें भी दूसरे भाव में पडऩे वाला लग्न शुभदायक रहता है । परन्तु द्वादश में पडऩे वाला अशुभ होता है, जैसे मेष के लिए वृष शुभ होता है परन्तु मीन अशुभ हो जाता है । पार्टनरशिप में षडाष्टक सम्बन्ध सर्वाधिक असफल एवं कलह का कारण बनता है । समसप्तक सम्बन्ध अर्थात् एक लग्न या सप्तम लग्न एक साधारण सम्बन्ध की ओर ही संकेत करता है ।।

ऐसे जातक पहले तो एक दुसरे के उपर जान छिड़कने वाले होते हैं लेकिन पार्टनरशिप के बाद किसी न किसी कारणवश वैमनस्यता उत्पन्न हो ही जाती है । उपर्युक्त सभी फल राशि के अनुसार भी समान रूप से ही घटित होते हैं । इसी बात को गुण मिलान करके उपर्युक्त फलों की भकूट दोष के द्वारा जानकारी प्राप्त किया जा सकता है । उपर्युक्त तथ्यों का पिता-पुत्र, भाई-बहन, पति-पत्नी एवं नौकर-मालिक के संबंधों को जानने में भी उपयोग किया जा सकता है ।।

मित्रों, कुण्डली मिलान में अष्टकूट एवं मंगल दोष के मिलान को प्राथमिकता दी जाती है । अष्टकूट गुण मिलान में वर्ण एवं वश्य मिलान कार्यशैली को दर्शाता है । तारा से उनके भाग्य की वृद्धि में आपसी सम्बन्धों का पता चलता है । योनि-मिलान से जातकों के शारीरिक सम्बन्धों की जानकारी मिलती है । ग्रह मैत्री स्वभाव में सहिष्णुता को दर्शाता है । गण मिलान से उनका व्यवहार, भकूट से आपसी सम्बन्ध एवं नाड़ी से उनके स्वास्थ्य और संतान के बारे में जाना जाता है ।।

उपर्युक्त अष्ट गुणों में केवल ग्रह मैत्री एवं भकूट ही ऐसे दो गुण हैं जो आपसी सम्बन्धों को बता देते हैं । अन्य गुण जीवन की अन्य भौतिकताओं को पूरा करने में सहायक होते हैं । मंगल दोष मिलान भी उनके अन्य सम्बन्धों के बारे में संकेत न देकर वैवाहिक जीवन का ही संकेत देता है । अत: परिवार में यदि सभी सदस्यों का आपस में द्वितीय-द्वादश या षडाष्टक सम्बन्ध न हो तो पारिवारिक कलह की संभावनायें कम रहती हैं ।।

मित्रों, अगर पति-पत्नी में अत्यधिक कलह हो तो पुरुष पांच मुखी रुद्राक्षों की माला में 1 एक मुखी, 1 आठ मुखी एवं 1 पंद्रह मुखी रुद्राक्ष डालकर धारण करें । इस माला पर प्रतिदिन प्रात: महामृत्युंजय मन्त्र अथवा ॐ नम: शिवाय इस मन्त्र का 1 माला जप करे । पत्नी पूरा मांग भरें, लाल बिंदी लगाये तथा लाल चूडिय़ां धारण करे । घर में भगवान श्री गणेश जी के यन्त्र को स्थापित करें साथ ही स्फटिक पर बने श्रीयन्त्र की भी प्राण प्रतिष्ठा करके स्थापना करे और इनकी नित्य पूजा करे ।।

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पति-पत्नी के बीच के कलह को दूर करने के लिए गौरी शंकर रुद्राक्ष धारण करना भी उत्तम फलदायी सिद्ध होता है । घर के जिस सदस्य को अत्यधिक क्रोध आता हो उसे पानी से भरे चांदी के लोटे या गिलास में चंद्रमणि डालकर वह पानी उसे पिलायें । वास्तु दोष को दूर करने के लिए एक कलश में पानी भरकर उसे नारियल से ढककर घर के ईशान कोण में रखें और उसका जल प्रतिदिन बदलते रहें ।।

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