अथ श्रीवंशवृद्धिकरं दुर्गाकवचम्।।

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Vansha Vriddhi kavacham
Vansha Vriddhi kavacham

अथ श्रीवंशवृद्धिकरं दुर्गाकवचम् अथवा वंशकवचम्।। Vansha Vriddhikaram Durga Kavacham or Vansha Vriddhi kavacham.

भगवन् देव देवेशकृपया त्वं जगत् प्रभो ।
वंशाख्य कवचं ब्रूहि मह्यं शिष्याय तेऽनघ ।
यस्य प्रभावाद्देवेश वंश वृद्धिर्हिजायते ॥१॥

श्री सूर्य ऊवाच ।।

शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि वंशाख्यं कवचं शुभम् ।
सन्तानवृद्धिर्यत्पठनाद्गर्भरक्षा सदा नृणाम् ॥२॥

वन्ध्यापि लभते पुत्रं काक वन्ध्या सुतैर्युता ।
मृत वत्सा सुपुत्रस्यात्स्रवद्गर्भ स्थिरप्रजा ॥३॥

अपुष्पा पुष्पिणी यस्य धारणाश्च सुखप्रसूः ।
कन्या प्रजा पुत्रिणी स्यादेतत् स्तोत्र प्रभावतः ॥४॥

भूतप्रेतादिजा बाधा या बाधा कुलदोषजा ।
ग्रह बाधा देव बाधा बाधा शत्रु कृता च या ॥५॥

भस्मी भवन्ति सर्वास्ताः कवचस्य प्रभावतः ।
सर्वे रोगा विनश्यन्ति सर्वे बालग्रहाश्च ये ॥६॥

अथ दुर्गा कवचम् ।।

ॐ पुर्वं रक्षतु वाराही चाग्नेय्यां अम्बिका स्वयम् ।
दक्षिणे चण्डिका रक्षेन्नैऋत्यां शववाहिनी ॥१॥

वाराही पश्चिमे रक्षेद्वायव्याम् च महेश्वरी ।
उत्तरे वैष्णवीं रक्षेत् ईशाने सिंह वाहिनी ॥२॥

ऊर्ध्वां तु शारदा रक्षेदधो रक्षतु पार्वती ।
शाकंभरी शिरो रक्षेन्मुखं रक्षतु भैरवी ॥३॥

कण्ठं रक्षतु चामुण्डा हृदयं रक्षतात् शिवा ।
ईशानी च भुजौ रक्षेत् कुक्षिं नाभिं च कालिका ॥४॥

अपर्णा ह्युदरं रक्षेत्कटिं बस्तिं शिवप्रिया ।
ऊरू रक्षतु कौमारी जया जानुद्वयं तथा ॥५॥

गुल्फौ पादौ सदा रक्षेद्ब्रह्माणी परमेश्वरी ।
सर्वाङ्गानि सदा रक्षेद्दुर्गा दुर्गार्तिनाशनी ॥६॥

नमो देव्यै महादेव्यै दुर्गायै सततं नमः ।
पुत्रसौख्यं देहि देहि गर्भरक्षां कुरुष्व नः ॥७॥

ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं श्रीं ऐं ऐं ऐं
महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती रुपायै
नवकोटिमूर्त्यै दुर्गायै नमः ॥८॥

ह्रीं ह्रीं ह्रीं दुर्गार्तिनाशिनी संतानसौख्यम् देहि देहि
बन्ध्यत्वं मृतवत्सत्वं च हर हर गर्भरक्षां कुरु कुरु
सकलां बाधां कुलजां बाह्यजां कृतामकृतां च नाशय
नाशय सर्वगात्राणि रक्ष रक्ष गर्भं पोषय पोषय
सर्वोपद्रवं शोषय शोषय स्वाहा ॥९॥

फल श्रुतिः ।।

अनेन कवचेनाङ्गं सप्तवाराभिमन्त्रितम् ।
ऋतुस्नात जलं पीत्वा भवेत् गर्भवती ध्रुवम् ॥१॥

गर्भ पात भये पीत्वा दृढगर्भा प्रजायते ।
अनेन कवचेनाथ मार्जिताया निशागमे ॥२॥

सर्वबाधाविनिर्मुक्ता गर्भिणी स्यान्न संशयः ।
अनेन कवचेनेह ग्रन्थितं रक्तदोरकम् ॥३॥

कटि देशे धारयन्ती सुपुत्रसुख भागिनी ।
असूत पुत्रमिन्द्राणां जयन्तं यत्प्रभावतः ॥४॥

गुरूपदिष्टं वंशाख्यम् कवचं तदिदं सुखे ।
गुह्याद्गुह्यतरं चेदं न प्रकाश्यं हि सर्वतः ॥५॥

धारणात् पठनादस्य वंशच्छेदो न जायते ।
बाला विनश्यंति पतन्ति गर्भास्तत्राबलाः कष्टयुताश्च वन्ध्याः ॥६॥

बाल ग्रहैर्भूतगणैश्च रोगैर्न यत्र धर्माचरणं गृहे स्यात् ॥

।। इति श्रीज्ञानभास्करे वंशवृद्धिकरं वंशकवचं सम्पूर्णम् ।।

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